भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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६६ सात्वतसंहिता अन्त में वह पीत कृष्ण, इसके बाद कलियुग के अन्त में वह कृष्ण शुक्ल रूप धारण करते हैं ॥ ८९-९० ॥ भेदः प्रागुदितैर्ज्ञेय आयुधाम्बरलाञ्छनैः ॥ ९१ ॥ समत्वादन्यथा केन विभागोऽत्रावधार्यते । प्राक् उदीयमान आयुध एवं अम्बर (=वस्त्र) के लाञ्छनों (= चिन्हों) से कलि भेद समझना चाहिये अन्यथा काल के समान होने से कौन उसके भेद का निश्चय कर सकता है ॥ ९१-९२ ॥ वर्णकालस्थानभेदेन वासुदेवादिनां ध्यानकथनम् युगाब्ददिनरात्र्यर्थप्रहराणां क्रमेण तु ॥ ९२ ॥ विभागकल्पनं कृत्वा नित्यमालक्ष्य वै प्रभुम् । देहेऽस्मिन् मूर्ध्नि हृदये नाभौ तु तदधः पुनः ॥ ९३ ॥ तस्मादामूर्धपादान्तं भूतये मुक्तयेऽन्यथा । ग्रीवांसजानुगुल्फेषु स्मरेत् सन्ध्युक्तलक्षणम् ॥ ९४ ॥ वासुदेवादिनां स्मरणस्य कालभेदान् साधकशरीरे स्थानभेदांश्चाह—युगाब्देति त्रिभिः । आलक्ष्य ध्यात्वेत्यर्थः । भूतये ऐश्वर्याय । मुक्तये मोक्षाय । एवं च धाम- चतुष्टयं मूर्धादिचतुःस्थानेषु क्रमेण वासुदेवादि(नां?न्) स्मरतामैहिकं लौकिकं फलम्, पुनः प्रातिलोम्येन नाभेरधस्तादारभ्य मूर्द्धान्तं स्थानचतुष्टयेऽनिरुद्धादिवासुदेवान्तान् स्मरतां मूर्तिरूपं फलं च सिध्यतीति भावः । सन्ध्युक्तलक्षणं युगसन्धिभेदेन गृहीत- सितरक्तादिशबलरूपं वासुदेवादिचतुष्टयमित्यर्थः ॥ ९२-९५ ॥ अब वासुदेव के स्मरण का स्थान साधक के शरीर में कब और कहाँ होता है इस बात को कहते हैं—युग, वर्ष, दिन-रात, दोपहर आदि के क्रम से विभाग की कल्पना कर वहाँ प्रभु को स्मरण करे । इसी प्रकार इस देह में भी शिर, हृदय, नाभि तथा उसके नीचे के भाग में वासुदेव का स्मरण करने से ऐहिक पारलौकिक दोनों प्रकार का फल प्राप्त होता है । इसलिये मुक्ति तथा मूर्ति के लिये शिर से लेकर पादान्त भगवत्स्मरण करे । ग्रीवा, अंस, जानु तथा गुल्फ में तथा युगादि सन्धियों में उक्त लक्षण का स्मरण करे ॥ ९२-९४ ॥ सृष्टिंसंहारयोगेन यः स याति परां गतिम् । इत्येकमूर्तेर्व्यूहानां विभवस्याखिलस्य च ॥ ९५ ॥ जो इस प्रकार सृष्टि क्रम से तथा संहार क्रम से भगवान् का स्मरण करता है, वह वैष्णव परमगति को प्राप्त करता है ॥ ९५ ॥ अवतारस्तथा ध्यानमर्चनं मन्त्रपूर्वकम् । स्वपदस्थानभेदेन प्रोक्तमेकसमाधिना ॥ ९६ ॥