भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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षष्ठः परिच्छेदः ७७ इति जयाख्योक्तेः, 'संस्थितेऽभिमुखीभावस्तदेवावाहनं हरेः' इति पाद्मोक्तेः, तथैवेश्वरपारमेश्वरयोः प्रतिपादितत्वाच्च ॥ १३-१८ ॥ तदनन्तर चक्रादि चिह्नों से अलङ्कृत तथा पलाशादि पत्रों से आबद्ध उस स्वर्ण के अर्घ्यपात्र को जल से पूर्ण करे । फिर अपने आगे स्थापित करे । उसमें तिल, पुष्प, दूर्वा एवं सिद्धार्थक (श्वेत सर्षप) डाल देवें ॥ १३-१४ ॥ फिर उस अर्घ्यपात्र को हाथ पर रख कर चार बार मन्त्र से उस जल का अवलोकन करे और ऐसी भावना करे कि सर्वव्यापक वह परमात्मा इस अर्घ्य के जल में मन्त्र मूर्ति के रूप में आ गये हैं ॥ १५ ॥ फिर उनके मन्त्र से आगच्छान्त पद से उनका इस प्रकार आवाहन करे 'जिस प्रकार सर्वगत वायु व्यजन के द्वारा प्रगट किया जाता है, उसी प्रकार सर्वगत हे विष्णो ! मैं आप का आवाहन करता हूँ । इस प्रकार हृदय कमल से निकाल कर उन प्रभु को भावदर्पण में संक्रान्त करे । फिर मन्त्रोच्चारण के अन्त में उन्हें वहाँ से हटा कर बाहर को वेदी में स्थापित करे ॥ १६-१८ ॥ मन्त्रमागच्छमानं तु निर्गतं तु स्वकात् पदात् ॥ १८ ॥ कालं पाद्यार्घ्यदानान्तमुत्थितं भावयेत् सदा । अथोपचर्यमाणं तं भोगैः कालानुकूलतः ॥ १९ ॥ स्नानालभनवस्त्रस्रग्दानेऽलङ्करणे तथा । अन्यत्र भोगपूजायां स्मरेत् पद्मासनादिना ॥ २० ॥ पुनस्तमेवोपविष्टं सानुकम्पं च सम्मुखम् । बिम्बं विनाऽन्यत्राधारे भवत्येवं महामते ॥ २१ ॥ केवलवेदिकुम्भमण्डलादिष्वावाहितस्य देवस्य तत्तदुपचारानुरोधेनावस्थानभेद- भावनमाह—मन्त्रमिति सार्धैस्त्रिभिः ॥ १८-२१ ॥ अपने पदों से निकल कर जब मन्त्र आने लगे तो, उस काल को पाद्य एवं अर्घ्यादि के निवेदन के लिये उचित समझकर, उसके निवेदन की भावना करे । इसी प्रकार पूजोपचार का भी उचित काल समझकर, कालानुकूल उन्हें स्नान, गन्ध, वस्त्र, पुष्प, माला एवं अलङ्कार द्वारा पूजा करे । योग पूजा से अतिरिक्त स्थिति में केवल पद्मासनादि से भगवान् का स्मरण कर लेवें ॥ १८-२० ॥ हे महामते! फिर साधक उन भगवान् को सानुग्रह अपने सम्मुख बैठा हुआ देखें । यह तब करे जब बिम्ब न हो, कोई और आधार हो तब ऐसा समझे ॥ २१ ॥ बिम्बाकृत्यात्मना बिम्बे समागत्यावतिष्ठते । करोत्यमूर्तामखिलां भोगशक्तिं तु चात्मसात् ॥ २२ ॥