सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७४ सात्वतसंहिता
'ॐ अर्घ्यं कल्पयामि' यह मन्त्र पढ़कर प्रथम कलश को वायव्यकोण में स्थापित करें। इसी प्रकार 'ॐ आचमनार्थं कल्पयामि' इस मन्त्र को पढ़कर ईशान कोण में दूसरा कलश स्थापित करे। इसी प्रकार 'ॐ स्नानार्थं कल्पयामि' इस मन्त्र को पढ़कर तीसरा कलश अग्निकोण में स्थापित करे। फिर पाद्यार्थं कल्पयामि इस मन्त्र को पढ़कर नैर्ऋत्य कोण में चौथा कलश स्थापित करे ॥ ९-१० ॥ अथ मङ्गलकुम्भानामुपकुम्भसमन्वितम् ॥ १० ॥ चतुष्कं विन्यसेद् बाह्ये दिक्क्रमेण सुपूजितम् । अथ परितः कलशाष्टकस्थापनमाह—अथेति । उपकुम्भसमन्वितम्, विदिक्षु स्थापनीयैश्चतुर्भिः कलशैः सहितमित्यर्थः । अथवा नृसिंहकल्पपरिच्छेदे शान्तिकादि- प्रकरणेषु वक्ष्यमाणरीत्योपस्थापनीयैश्चतुर्भिरुपकुम्भैः समन्वितमित्यर्थः । मङ्गल- कुम्भानां चतुष्कं प्रागुदीरितं (सात्वत० ६।७) चतुर्दिक्षु स्थापनीयकलशचतुष्टय- मित्यर्थः ॥ १०-११ ॥ इसी प्रकार मङ्गल कुम्भ के समीप बाहर के चारों दिशाओं में क्रमशः पूर्व की भाँति सुपूजित चार उपकुम्भ भी स्थापित करे ॥ १०-११ ॥ भगवद्विम्बपूर्वं तु यागाङ्गं प्रागुदीरितम् ॥ ११ ॥ एकं सुलक्षणं तत्र ततो मध्येऽवतार्य च । तत्कलशाष्टकमध्ये भगवद्विम्बाद्यन्यतमस्थापनमाह—भगवदिति । प्रागुदीरितं (षष्ठा? पञ्चमा) ध्यायान्ते उक्तमित्यर्थः । भद्रपीठोपरि केवलचरबिम्बाद्यर्चनप्रकरणे । एवं परितः कलशाष्टकस्थापनं कार्यम् । स्थिरबिम्बार्चनविषये तु तदप्रकृतम् । अत एव ईश्वरपारमेश्वरयोर्नोक्तं च ॥ ११-१२ ॥ इस प्रकार ८ कलशों की स्थापना बहिर्याग में कही गई । बहिर्याग के अङ्गभूत भगवद् बिम्ब के विषय में पहले कह दिया गया है (द्र. पञ्चमाध्याय के अन्त में) । उन आठ कलशों के मध्य में सुलक्षण भगवद् बिम्ब की स्थापना करनी चाहिए ॥ ११-१२ ॥ बिम्बशोधनकथनम् भुक्तमर्घ्यादिकं तस्मादपनीयाभिवन्द्य च ॥ १२ ॥ उशीरवंशकूर्चेन क्षालयेदम्भसा ततः । बिम्बशोधनमाह—भुक्तिमिति । भुक्तमर्घ्यादिकं पूर्वदिने, यद्वाऽभिगमणार्चन- काले भगवद्भुक्तार्घ्यपुष्पादिकमित्यर्थः । उशीरवंशकूर्चेन लाम(ञ्छ?ज्जक)- पिञ्जुलेन ॥ १२-१३ ॥ बिम्बशोधन का प्रकार कहते हैं—पूर्व दिन में बिम्ब पर निवेदित भुक्त अर्घ्यादि पदार्थों को उशीर अथवा बाँस के कूँचे (झाडू) से हटा कर उसका अभिनन्दन करें। फिर स्वच्छ जल से सुलक्षण अर्घ्य पात्र का प्रक्षालन करे ॥ १२-१३ ॥