भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 163

१०४ सात्वतसंहिता पवित्रकं तु तन्मध्ये चतुर्दर्भकृतं न्यसेत् ॥ १०२ ॥ उद्धृत्योद्धृत्य हस्तेन जलं तत्रैव निक्षिपेत् । चातुरात्मीयं मन्त्रं च जपमानो हि साधकः ॥ १०३ ॥ भूयस्तदम्भसा सर्वं प्रोक्षयेद् विष्टरेण तु । शेषस्यास्रावणं कुर्यात् सर्वदिक्षु स्तरोपरि ॥ १०४ ॥ पुनरेवाम्भसाऽऽपूर्य तन्मध्ये परमेश्वरम् । ध्यात्वाऽर्चयित्वा संस्थाप्य त्वग्रतस्तदनन्तरम् ॥ १०५ ॥ प्रणीतासंस्कारविधिमाह—आदायेति चतुर्भिः । चातुरात्मीयं मन्त्रं पूर्वोक्तं वासु- देवादिमन्त्रचतुष्टयमित्यर्थः ॥ १०२-१०५ ॥ अब प्रणीता संस्कार की विधि कहते हैं—अर्घ्यपात्र से पवित्रीकरण के पश्चात् जल सहित प्रणीता पात्र हाथ में ले कर, उसमें चार कुशों की पवित्री स्थापित करे। फिर हाथ से कुशा द्वारा उसका जल निकाल कर साधक चातुरात्मीय मन्त्र पढ़ते हुए उसी होमोपकरण सामग्री पर छिड़के। फिर उसी विष्टर से प्रणीता का जल लेकर सभी सामग्री का प्रोक्षण करे और शेष जल को संस्तरण के ऊपर समस्त दिशाओं में छिड़क देवे ॥ १०२-१०४ ॥ पुनः उस प्रणीता में जल भरे और उसके मध्य में परमेश्वर का ध्यान करे, उनका अर्चन करे, फिर उसे अपने आगे स्थापित कर देवे ॥ १०५ ॥ सम्प्रोक्ष्यार्घ्याम्भसा चेध्मांश्चतुर्धा संविभज्य च । पूजयेदर्घ्यपुष्पाभ्यां द्वादशाक्षरविद्यया ॥ १०६ ॥ प्रणीते चापरस्मिन् वै पात्रे चाग्रे कृते सति । सपवित्रं तु तत्रार्घ्यं दत्वा चक्रं तु विन्यसेत् ॥ १०७ ॥ चतुर्मूर्तिं तदूर्ध्वे तु ध्यात्वाऽभ्यर्च्य यथाक्रमम् । तत्पात्रमुत्तरस्यां च कृत्वा सम्पूज्य वै पुनः ॥ १०८ ॥ इध्मप्रक्षेपणिमाह—सम्प्रोक्ष्येति । द्वादशाक्षरविद्यया व्यापकद्वादशाक्षरमन्त्रेणे- त्यर्थः । अन्य प्रणीतासंस्कारमाह—प्रणीत इति द्वाभ्याम् ॥ १०६-१०८ ॥ अब इध्मप्रक्षेपण विधि कहते हैं—साधक अर्घ्य के जल से समिधाओं पर जल छिड़क कर उसे चार भागों में प्रविभक्त करे और द्वादशाक्षर मन्त्र से अर्घ्य पुष्प द्वारा उसकी पूजा करे। पहले जिस प्रणीता पात्र को आगे रखा गया था (द्र० ६.१०५) उसमें सपवित्रक अर्घ्य डाल कर चक्र न्यास करे ॥ १०६-१०७ ॥ फिर उसमें वासुदेवादि चतुर्मूर्ति का ध्यान कर यथाक्रम अर्चन करे। ध्यान, पूजन के पश्चात् उस पात्र को उत्तर दिशा में स्थापित कर देवे ॥ १०८ ॥