सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठः परिच्छेदः १९९ इसलिए विधिज्ञ क्रिया-पर ब्राह्मणों को सव्यभिचार (= संकेत युक्त) मौन वर्जित करना चाहिए। शुभ और व्यभिचाररहित जो मौन हो, उसे सभी कर्मों में धारण करना चाहिये ॥ १७३-१७४ ॥ यदङ्गसङ्केतमयैरव्यक्तैर्नासिकाक्षरैः ॥ १७४ ॥ कृतमोष्ठपुटैर्बद्धैर्मौनं तत्सिद्धिहानिकृत् । स्वयमेव सुबुद्ध्या यत् सर्ववस्तुषु वर्तते ॥ १७५ ॥ शब्दैरनुपदिष्टैस्तु तन्मौनं सर्वसिद्धिदम् । मौनस्य दोषगुणावाह—यदिति द्वाभ्याम् ॥ १७४-१७६ ॥ अङ्ग संकेतमय, अव्यक्त एवं नाक से उच्चारित अक्षर वाले ब्राह्मण का मौन अथवा ओष्ठ पुटों को बाँधकर किया गया मौन सिद्धि में हानि करने वाला है । यह मौन व्यभिचार युक्त है । अतः इसका त्याग करना चाहिये । जो स्वयमेव सुबुद्धि से सभी वस्तुओं में विद्यमान है, उपदिष्ट शब्द से रहित है, ऐसा मौन सब प्रकार की सिद्धि प्रदान करता है ॥ १७४-१७६ ॥ तस्माद्वै श्राद्धभोक्तॄणां दिव्ये वा पितृकर्मणि ॥ १७६ ॥ दद्यान्नैवेद्यवत् सर्वं मर्यादाभ्यन्तरेऽग्रतः । येनाचमनपर्यन्तं कालं तिष्ठन्ति वाग्यताः ॥ १७७ ॥ अथोत्तराचमनपर्यन्तमङ्गसंकेतादिदोषाभावसिद्ध्यर्थं तदपेक्षितसर्ववस्तून्यपि तत् पुरतो मर्यादान्तराले (त्यादी?स्थापनीयानी)त्याह—तस्मादिति । मर्यादाकल्पनाप्रकार- स्तूक्तः पारमेश्वरे—'अथास्त्रपरिजप्तेन भूतिना वाऽथ शङ्कुना । मसृणेनाश्मचूर्णेन परिघां स्वधयाऽथवा ॥ बहिस्तदासने कुर्यादग्रे दैर्घ्याच्छ्रमाधिकम् । वैपुल्याच्छममानं तु प्राग्वत् पावनतां नयेत् ॥ (७।३२७-३२८) इति ॥ १७६-१७७ ॥ इस कारण साधक श्राद्ध कर्म में भोजन करने वाले ब्राह्मणों को एवं दैव कर्म में, अथवा पितृकर्म में मर्यादा के भीतर ही रहकर नैवेद्य के समान अन्नादि प्रदान करे । जिससे आचमन पर्यन्त काल तक वे चुप-चाप मौन होकर भोजन करें ॥ १७६-१७७ ॥ विधिनानेन वै नित्यं यागयज्ञे तु वैष्णवे । संविभागः पितॄणां च कार्यः सद्रविणैर्नरैः ॥ १७८ ॥ एवंविधपितृसंविभागस्य धनिकविषयतामाह—विधिनेति ॥ १७८ ॥ धनी मनुष्य पितरों के कार्य में इसी प्रकार पितरों का संविभाग करके भोजन करावें ॥ १७८ ॥ कृत्वा तिलोदकान्तं वा फलमूलैः स्वशक्तितः । तदर्थं ग्रासमात्रं तु दद्याद् गोष्वथ भैक्षुके ॥ १७९ ॥