सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३० सात्वतसंहिता जानु से लेकर नाभि मण्डल तक प्रद्युम्न मन्त्र से और नाभि से कर्ण पर्यन्त सङ्कर्षण मन्त्र से न्यास करे ॥ १९६ ॥ कान से ब्रह्मरन्ध्र तक चतुर्थ मन्त्र से न्यास करे । इसके बाद अपनी इच्छानुसार पद्मासन आदि से बैठे । अपनी आत्मा में चातुरात्म्य अभिमान का ध्यान करे ॥ १९७-१९८ ॥ समं कायशिरोग्रीवं सन्धाय सह वक्षसा ॥ १९८ ॥ दृङ्नासाग्रगता कार्या विनिमीलितलक्षणा । जिह्वा तालुतलस्था च सान्तरे दशनावली ॥ १९९ ॥ ईषदोष्ठपुटौ लग्नौ धार्ये द्वे बाहुकूर्परी । ऊरुमध्यप्रदेशे तु हस्तौ नाभावधो न्यसेत् ॥ २०० ॥ अधरोत्तरयोगेन वामदक्षिणतः क्रमात् । अचलं योगपट्टेन त्वेवं सन्धार्य विग्रहम् ॥ २०१ ॥ सङ्कोच्यापानदेशं त्वप्युपरिष्टात् तमेव हि । विकास्यावर्णहीनेन हार्णेनालक्ष्यमूर्त्तिना ॥ २०२ ॥ अथ योगानुष्ठानकाले कायशिरःप्रभृत्यवयवानां सन्धारणक्रममाह—सममिति सार्धैश्चतुर्भिः ॥ १९८-२०२ ॥ उस समय काय, शिर, ग्रीवा तथा वक्षस्थल को सीधे स्थापित करे और नेत्रों को बन्द कर उसे नासा के अग्रभाग पर स्थापित करे । जिह्वा को तालु के नीचे, दन्त पङ्क्तियों को मुख के भीतर स्थापित करे ॥ १९८-१९९ ॥ दोनों ओष्ठ पुटों को किञ्चिन्मात्र संलग्न रखे तथा दोनों बाहुकूर्परों को ऊरु के मध्यप्रदेश में रखे और दोनों हाथों को बायें दाहिने कर ऊपर नीचे कर नाभि के नीचे स्थापित करे । इस प्रकार यौगिक रीति से शरीर को स्थापित कर अपान देश को संकुचित करे । फिर ऊपर अ वर्ण से हीन तथा ह वर्ण के साथ लक्षित मूर्त्ति के सहित उसको विकसित करे ॥ २००-२०२ ॥ विषयान्तर्निविष्टं तु क्रमाच्चित्तं समाहरेत् । कुर्याद् वै बुद्धिल्लीनं तु तां च कुर्यात् स्वगोचरे ॥ २०३ ॥ ततो विषयेभ्यश्चित्तमाकृष्य बुद्धौ संयोज्य बुद्धिं स्वगोचरे भगवति न्यसेदि- त्याह—विषयेति । तथा च पञ्चरात्ररक्षायां शाण्डिल्यस्मृतौ— ईदृशः परमात्माऽयं प्रत्यगात्माऽयमीदृशः । तत्सम्बन्धानुसंधानमिति योगः प्रकीर्तितः ॥ योगो नामेन्द्रियैर्वश्यैर्बुद्धेर्ब्रह्मणि संस्थितिः ।