भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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सप्तमः परिच्छेदः १३९ इत्यादि। एतदलाभे पञ्चगव्यम्, तस्याप्यलाभे घृतं वा ग्राह्यमिति भावः। तथा च पाद्मे स्नपनाध्याये— अलाभे पञ्चगव्यानां घृतमेवैकमिष्यते। पञ्चगव्येषु यस्य स्यादलाभस्तत्कृते घृतम्॥ इति॥ प्रभुं स्मरन् उदरगं मलं निस्सृत्येत्यनेन प्राणायामः सूच्यते यथा, तथा वक्ष्यति प्राणायामं नृसिंहकल्पपरिच्छेदे— नाभिदेशस्थितं ध्यात्वा देवं संगृह्य कल्मषम्। निस्सृतं वायुमार्गेण द्वादशान्तावधौ क्षिपेत्॥ निरस्तपापमाकृष्य वातचक्रसमन्वितम्। नासाग्रेण तु मन्त्रेशं देहसम्पूरणाय च॥ तं ध्यायेद् हृदयस्थं च गतिरुद्धेन वायुना। (१७।१८-२०) इति॥ ११-१३॥ संकल्पमन्त्रमाह—ॐ व्रताधिपतय इति। परिपीडैः, उपवासैरित्यर्थः॥ १३-१४॥ कार्त्तिक महीने की दशमी तिथि को सायङ्काल के समय घृत से, पञ्चगव्य से, अथवा बिम्ब के पादोदक से, अपने कोष्ठ की संशुद्धि करे और भीतर का पाप बाहर निकाल देवे। प्रभु का स्मरण करते हुए हाथ में कुशोदक का जल लेकर उसे शरीर पर छिड़के, फिर आचमन करे॥ ११-१२॥ फिर व्रत के लिये संकल्प करे। अब संकल्प का मन्त्र कहते हैं—'ॐ व्रताधिपतये देव....त्वामहं तोषयाम्यजम्' (यह संकल्प का स्वरूप है। संकल्प में आये हुए 'परिपीडैः' का अर्थ 'उपवासों के द्वारा' है)॥ १३-१४॥ प्रयतो दर्भशय्यायां क्ष्मातले रजनीं नयेत्॥ १४॥ एकादश्यां प्रभातेऽथ स्नात्वा देवमधोक्षजम्। ध्यात्वाऽभ्यर्च्य यथापूर्वं नानानामान्तरैः शुभैः॥ १५॥ एवं संकल्पानन्तरं तस्यां रात्रौ केवलभूतले कुशोपरि शयनमाह—प्रयत इत्यर्धेन। एकादशीप्रभातकृत्यमाह—एकादश्यामिति। नानानामान्तरैः सहस्त्रनामादि- भिरित्यर्थः। स्तुत्वेति शेषः॥ १४-१५॥ तदनन्तर कुशा के बिस्तर पर रात बितावै। प्रातःकाल एकादशी के दिन स्नान कर देवाधिदेव अधोक्षज भगवान् विष्णु का ध्यान कर उनके कल्याणकारी एवं अनेक भिन्न-भिन्न नामों से पूर्व की भाँति उनकी अर्चना करे॥ १४-१५॥ वासुदेवस्य लाञ्छन ध्यानप्रकारकथनम् कराभ्यां लम्बमानाभ्यां संस्थितौ दक्षिणादितः।