भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 204

सप्तमः परिच्छेदः १४५ वासुदेवस्येत्यर्थः । तिर्यक् स्वपक्षदेशाभ्यां स्तनाख्यान्मण्डलाद् बहिः = पार्श्वद्वयेऽपि वक्षःस्थलाद् बहिरित्यर्थः । तत्सम इति यावत् । मुख्यहस्ते = दक्षिणहस्त इति यावत् । द्वितीयस्य = सङ्कर्षणस्य । तथा = वासुदेवहस्तवदित्यर्थः । शब्दपूर्णः = शङ्खः । त्रिषु = तर्जन्यादिष्वित्यर्थः ॥ ३७-४९ ॥ अब केवल मुमुक्षुओं के अनुष्ठेय व्रत में काल भेद और लाञ्छन (चिह्न) तथा न्यास भेद 'भक्तिपूर्वात्' से आरम्भ कर..........फलमाप्नोति साधकः पर्यन्त श्लोकों से (७.३७-७.४९) कहते हैं—जो ब्राह्मणादि वर्ण भक्तिपूर्वक कैवल्य से यत्न द्वारा भगवान् की प्रार्थना करते हैं अब उनके लिये विशेष रूप से व्रताचरण का प्रकार कहते हैं ॥ ३७ ॥ श्रावण की दशमी को पूर्वोक्त सभी विधि सम्पादन करे । फिर कुशोदक का अभ्यङ्ग (प्रोक्षण) कर भगवान् का स्मरण करते हुए 'सर्वभूतमयाऽनादे ...... तिमिरं हर' इस श्लोक से प्रार्थना करे ॥ ३८-३९ ॥ इस प्रकार प्रार्थना के बाद ध्यान करते हुए पूर्ववत् चतुर्मूर्त्ति देव का यजन करते हुए गौण एवं मुख्य महत्त्व वाले जितन्तादि पदों से, पहले व्यस्त (= अलग-अलग), इसके बाद संक्षेप में (एक-एक समस्त श्लोकों को वाच्य भेदोक्ति के योग से अथवा एक-एक श्लोकों से) हे महामते ! मूर्त्ति की अर्चना करे । प्रणिपातादि सभी कार्य पहले की तरह आवर्त्तन करे ॥ ४०-४२ ॥ अब मोक्षमात्र के फल की इच्छा रखने वाले शूद्रान्त सभी वर्णों को लाञ्छन अनिरुद्धान्त सहित विन्यास जिस प्रकार करना चाहिये, उसे सुनिये ॥ ४०-४३ ॥ भगवान् वासुदेव के (तिर्यक् स्तनाख्यान् मण्डलात् बहिः) वक्षःस्थल के समान दाहिने हाथ की मुठ्ठी में गदा तथा कुक्षिकुहर से बाहर बायें हाथ से समाक्रान्त अँगूठे पर स्थित पाञ्चजन्य का स्मरण करे । इसके बाद द्वितीय सङ्कर्षण के दाहिने हाथ में स्थित श्रेष्ठ शंख का ध्यान करे और मुष्टी सहित बायें हाथ के अँगूठे के ऊपर स्थित चक्र का ध्यान करे । इसी प्रकार प्रद्युम्न के बायीं ओर गदा तथा दक्षिण शब्द पूर्ण शङ्ख का स्मरण करे ॥ ४४-४७ ॥ अनिरुद्ध के दाहिने हाथ में सूर्य के समान तेजस्वी कमल तथा बायें हाथ की तर्जनी, मध्यमा एवं अङ्गुष्ठ इन तीन अङ्गुलियों पर स्थित चक्र का ध्यान करना चाहिए ॥ ४८-४९ ॥ निष्कामैः सकामैश्च देयानि द्रव्याणि सक्षीरमन्नपात्रं तु विहितं मासि मासि च ॥ ४९ ॥ दानार्थं व्रतपर्यन्ते हेमरत्नतिलान्वितम् । निष्कामव्रतिनां नित्यमन्ते गोदानमेव च ॥ ५० ॥