भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 205

१४६ सात्वतसंहिता निष्कामानां व्रते प्रतिमासं कर्तव्यदानद्रव्यं संवत्सरान्ते देयद्रव्याणि चाह-- सक्षीरमिति सार्धेन ॥ ४९-५० ॥ इस प्रकार ऊपर कहे गये के अनुसार चातुरात्म्य स्वरूप का ध्यान करने से साधक फल प्राप्त करता है। कामनारहित व्रत करने वालों के लिये प्रतिमास तथा संवत्सरान्त देय द्रव्य कहते हैं—निष्काम व्रती मास-मास में दूध सहित अन्न पात्र दान देवे तथा व्रत के अन्त में तिल के सहित सुवर्ण एवं रत्न देवे और गोदान करे ॥ ४९-५० ॥ प्रतिमासं सकामानां दधिपात्रं च सोदनम् । फलानि हेमयुक्तानि त्वन्ते भूदानमेव च ॥ ५१ ॥ तिलान्युदककुम्भं च पत्रपुष्पादिनार्चनम् । यथाशक्ति दरिद्राणां हिरण्यं गोसमं स्मृतम् ॥ ५२ ॥ तथा सकामानां देयद्रव्याण्याह—प्रतिमासमिति सार्धेन । अशक्तानां तु गोदान- भूदानप्रत्याम्नायत्वेन यथाशक्ति हिरण्यदानमाह—दरिद्राणामित्यर्धेन । गोसममित्यत्र गोशब्देन भूमिरप्युच्यते ॥ ५१-५२ ॥ सकाम व्रत करने वाले साधक प्रतिमास ओदन सहित दधिपात्र देवें एवं सुवर्णयुक्त फल देवें। अन्त में भूदान करें ॥ ५१ ॥ साधनहीन दरिद्र यथाशक्ति पत्रपुष्पादि से ही अर्चन करें। वह तिल एवं उदक सहित कुम्भ देवे, उसके लिये हिरण्य ही भूदान के समान है ॥ ५२ ॥ दानेऽर्चने तु शूद्राणां व्रतकर्मणि सर्वदा । असिद्धान्नं तु विहितं सिद्धं वा ब्राह्मणेच्छया ॥ ५३ ॥ शूद्रैस्तु व्रतान्तेऽपक्वान्नं देयम्, सत्यां ब्राह्मणानुज्ञायां पक्वान्नं वा देयमित्याह— दान इति । "आर्याध्युषिताः शूद्राः कुर्युः" (आ० ध० २।३।४) इति ब्राह्मणानुज्ञया शूद्राणामपि पाकाधिकारविधानात् सिद्धं वा ब्राह्मणेच्छयेत्युक्तमविरुद्धं ज्ञेयम् । एवं स्वस्ववर्णाश्रमधर्माविरुद्धमेवाराधनं कार्यमित्यर्थः ॥ ५३ ॥ शूद्रों के लिये व्रत कर्म में दान और अर्चन के विषय में असिद्ध अन्न का विधान कहा गया है, अथवा ब्राह्मण की इच्छानुसार सिद्ध (पके हुए) अन्न का दान भी किया जा सकता है ॥ ५३ ॥ स्वकर्मणा यथोत्कर्षमभ्येति न तथार्चनात् । तस्मात् स्वेनाधिकारेण कुर्यादाराधनं सदा ॥ ५४ ॥ सहेतुकमाह—स्वकर्मणेति ॥ ५४ ॥ शूद्र भगवान् के पूजन से उतना उत्कर्ष नहीं प्राप्त करता है जितना अपने