सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
पृष्ठ 207, कुल 837 में से
संदर्भ में पढ़ें१४८ सात्वतसंहिता संकल्प लेवे। फिर प्रतिमाह दानादि द्वारा १२ संवत्सर पूर्ण कर उसके अन्त में व्रतेश्वर जगन्नाथ को प्रसन्न करे। फिर पुनः व्रतारम्भ कर संवत्सर के अन्त में व्रतेश्वर भगवान् विष्णु को प्रसन्न करे। इस प्रकार अग्रिम मास की दशमी से लेकर अन्तिम (एकादशी) तक व्रत की समाप्ति में भगवान् का पूजन करते हुए क्रमशः १२ वर्ष व्यतीत करे ॥ ५७-६० ॥ व्रत के अन्त में वह अधिकारी ब्राह्मण दान एवं वस्त्र और अनुलेपन से बारह ब्राह्मणों का यजन करे (संवत्सरान्त विहित दान धर्म बारह वत्सरान्त में करे) ॥ ६१ ॥ स्वमूर्त्याराधनाद्येन कर्मणा ह्येतदेव हि । कार्यं व्रतमिदं भक्त्या ज्येष्ठाद्यं क्षत्रियेण तु ॥ ६२ ॥ वैश्येनाश्वयुजादादावाचर्तव्यं समासतः । मौद्गलेन तु माघाद्यं पालनीयं यथाक्रमम् ॥ ६३ ॥ इदं व्रतोत्तमं दिव्यमपवर्गफलप्रदम् । विहितं सर्ववर्णानामविरुद्धं च सर्वदा ॥ ६४ ॥ चान्द्रायणायुतसमं सा सृष्टेः कल्मषापहम् । अस्य व्रतस्य क्षत्रियादीनामपि कालभेदेनानुष्ठानमाह—स्वमूर्तीति त्रिभिः । स्व- मूर्त्याराधनाद्येन स्वस्ववर्णोक्तसङ्कर्षणादिक्रमेणेत्यर्थः ॥ ६२-६४ ॥ इस प्रकार यही व्रत स्व स्व वर्णोक्त सङ्कर्षणादि क्रम से क्षत्रियादिक भी काल भेद से भक्तिभाव पूर्वक करे । ब्राह्मण के लिये विधान पहले कह आये हैं और क्षत्रिय ज्येष्ठ मास से व्रतारम्भ करे ॥ ६२ ॥ वैश्य आश्विन आदि मास के आदि में संक्षेप में अर्चना कर व्रतारम्भ करे और शूद्र माघ के आदि से यथाक्रम इस व्रत का आरम्भ नियम कर पालन करे । यह व्रतोत्तम दिव्य है और मोक्ष रूप फल देने वाला है । अतः यह व्रत सब वर्णों के लिये विहित है । किसी के लिये भी विरुद्ध नहीं है । यह व्रत अयुत चन्द्रायण व्रत के समान फलदायी है और सृष्टि के समस्त लोगों का कल्मष दूर करने वाला है ॥ ६३-६५ ॥ व्रतान्तरकथनम् वक्ष्ये व्रतवरं चान्यत् कर्तव्यत्वेन कर्मिणाम् ॥ ६५ ॥ मोक्षैकफलकामानामन्येषां भावितात्मनाम् । मोक्षदं देहपाताद् यच्चातुरात्म्यैकयाजिनाम् ॥ ६६ ॥ यथाभिमतमासस्य दशम्यां पातयेज्जलम् ।