सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमः परिच्छेदः १४९ नत्वा व्रतेश्वरं प्राग्वद् वत्सरद्वितयस्य च ॥ ६७ ॥ विशेषाच्छावणे कुर्यात् सङ्कल्पं कार्तिकेऽपि च । आरम्भमासादारभ्य निष्ठाख्यं यावदेव हि ॥ ६८ ॥ द्विषट्कमुपवासानामेकवृद्ध्या तु वर्धयेत् । होमान्तमर्चनं कृत्वा पूर्ववत् तन्मयान् यजेत् ॥ ६९ ॥ ततस्तु परिपीडानां वत्सरं ह्रासमाचरेत् । कार्यमारम्भमासे तु पूर्वं द्वादशरात्रिकम् ॥ ७० ॥ एकैकं लोपयेत् तावद् यावदब्दः समाप्यते । कुर्याद् व्रतसमाप्तिं तु पूर्ववत् पूजनादिना ॥ ७१ ॥ वृद्धिह्रासक्रमेणैतद् व्रतमुक्तं मया च ते । अनायासेन वै येन प्राप्यते शाश्वतं पदम् ॥ ७२ ॥ अथ संवत्सरद्वयानुष्ठेयमुपवासवृद्धिह्रासान्वितं व्रतान्तरमाह—चान्द्रायणायुत- सममित्यारभ्य प्राप्यते शाश्वतं पदमित्यन्तम् ॥ ६५-७२ ॥ अब दो संवत्सर तक अनुष्ठेय उपवास की वृद्धि तथा ह्रास क्रम से समन्वित अन्य व्रत कहता हूँ—यह व्रत एक मात्र मोक्ष की कामना करने वाले सांसारिक जनों के लिये है। यह व्रत एक मात्र चातुरात्मक का यजन करने वालों के लिये देह पात के अनन्तर मोक्ष देने वाला कहा गया है ॥ ६५-६६ ॥ साधक व्रतेश्वर को नमस्कार कर दो संवत्सर पर्यन्त व्रत के लिये अपने अभीष्ट मास की दशमी तिथि को संकल्प लेवे । विशेष रूप से श्रावण मास में अथवा कार्त्तिक मास में व्रत का संकल्प लेना अच्छा है । आरम्भ मास से अन्तिम मास तक के लिये संकल्प लेना चाहिये । १२ मास तक उपवास में एक-एक उपवास के बढ़ाने का क्रम रखे तथा १२ मास तक एक-एक उपवास के ह्रास का क्रम करे । आरम्भ मास में १२ पूर्ववत् उपवास करे । तदनन्तर एक-एक उपवास का लोप करे । फिर व्रत समाप्ति में पूर्ववत् पूजनादि क्रिया करे । हे सङ्कर्षण! इस प्रकार वृद्धि एवं ह्रास के क्रम वाला यह व्रत मैंने आपसे कहा है जिससे अनायास शाश्वत फल की प्राप्ति होती है ॥ ६७-७२ ॥ द्वादशाख्यव्रतविधानम् व्रतानामुत्तमं धन्यं द्वादशाख्यमतः शृणु । अकामानां सकामानान्ते तुल्यफलं हि यत् ॥ ७३ ॥ सितपक्षात् तु चैत्रस्य कार्याऽऽद्येऽहनि कल्पना । गतेऽर्धरात्रसमये चा प्रभातात् ततोऽच्युतम् ॥ ७४ ॥