सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमः परिच्छेदः १५५ यत्र दाता ग्रहीता च द्वावेव कलुषात्मकौ। दृष्टादृष्टविनाशार्थं दानं द्वाभ्यां हतं तु तत् ॥ १०४ ॥ दातृप्रतिग्रहीत्रोरुभयोरपि कलुषात्मकत्वे दानवैफल्यमाह—यत्रेति ॥ १०४ ॥ जहाँ दाता और प्रतिगृहीता दोनों ही पापी हैं, दृष्टादृष्ट के विनाश के लिये ऐसा दानी तथा प्रतिग्राही दोनों ही हत हैं (विफल हैं) ॥ १०४ ॥ प्रागेवं चित्तसंशुद्धिं भावशुद्धिसमन्विताम्। निश्चयीकृत्य यत्नेन दिव्यमायतनं व्रजेत् ॥ १०५ ॥ व्रतसंसिद्धये नूनं सिद्धायतनमेव वा। अथवाऽऽयतनं रम्यमासन्ननगरादिकम् ॥ १०६ ॥ निर्विघ्नेन व्रतं यस्मान्निष्पद्येतात्र कर्मिणाम्। कर्मवाङ्मनसैः शुद्धस्तपोनिष्ठः क्रियापरः ॥ १०७ ॥ यो नान्यदेवतायाजी तत्वतो भगवन्मयः। कस्मिंश्चिद् वैभवे रूपे व्यूहीये वा सुबुद्धिमान् ॥ १०८ ॥ बद्धलक्ष्यो भवेद् भक्त्या त्वाप्तागमनिदर्शनात्। एवं भावशुद्धिसम्पादितां चित्तशुद्धिं पूर्वं निश्चित्य व्रतानुष्ठानार्थं सैद्धमानुषस्थाने- ष्वन्यतमं गत्वा तत्र विभवाकृतौ व्यूहाकृतौ वा भगवति व्रतान्तं न्यस्तचित्तो भवे- दित्याह—प्रागेवमिति सार्धैश्चतुर्भिः । दिव्यं = स्वयंव्यक्तमित्यर्थः ॥ १०५-१०९ ॥ अब चित्तशुद्धि सम्पादन कर व्रतानुष्ठान के लिये सिद्ध मानुषादि स्थानों में तथा वैष्णवायतनों में जाने को कहते हैं—पहले व्रत की सिद्धि के लिये प्रयत्नपूर्वक भावशुद्धि समन्वित चित्त की शुद्धि का निश्चय कर दिव्य आयतन, सिद्ध आयतन, अथवा किसी भी आयतन में जावे जो किसी रम्य नगर के सन्निकट हो । वह ऐसे स्थान पर जाए जिससे यज्ञ सम्पादन करने वाले कर्मी का निर्विघ्न यज्ञ सम्पन्न हो जावे । यज्ञ का सम्पादन करने वाला कर्मी कर्म, वाणी और मन से सन्तुष्ट तथा तपोनिष्ठ होना चाहिये । क्रिया परायण हो तथा अन्य देवता में आस्था रखने वाला नहीं होना चाहिये । वह वैष्णव तत्त्वतः भगवन्मय तथा भगवान् के किसी वैभव रूप में अथवा व्यूहरूप में बुद्धिमान भक्त हो । किसी आप्त आगम तथा वैष्णव आगम का ज्ञाता तथा भक्तिपूर्वक उसे अपने लक्ष्य में स्थिर होना चाहिए ॥ १०७-१०८ ॥ दिव्यायतनलक्षणकथनम् तस्यापि तादृशानां च भविनामनुकम्पया ॥ १०९ ॥