सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६० सात्वतसंहिता इममर्थं ज्ञात्वा निखिलं पुरुषार्थप्राप्त्यर्थं भगवति दृढचित्तेन भवितव्यमित्याह— ज्ञात्वेति ॥ १२४ ॥ ॥ इति श्रीमौञ्ज्यायनकुलतिलकस्य यदुगिरीश्वरचरणकमलार्चकस्य योगानन्दभट्टाचार्यस्य तनयेन अलशिङ्गभट्टेन विरचिते सात्वततन्त्रभाष्ये सप्तम परिच्छेदः ॥ ७ ॥ — ❦ — यदि कदाचित् किसी कारणवश इस व्रत में विघ्न पड़ जाये तब भी साधक को भयभीत नहीं होना चाहिये क्योंकि जिसने व्रत का संकल्प ले कर उसके समाप्ति पर्यन्त का अनुष्ठान ले लिया है वह विघ्नित होने पर भी उस अनुष्ठान को पूरा करे क्योंकि 'भगवान् उस व्रत को अन्त काल तक अमृत से सींचते रहते हैं'—ऐसा समझ कर अपनी कामना की प्राप्ति के लिये तथा संसार से भयभीत होकर साधक अपने व्रतानुष्ठान के लक्ष्य में भी स्थिर रहे ॥ १२२-१२४ ॥ ॥ इस प्रकार डॉ० सुधाकर मालवीय कृत सात्त्वत संहिता के अमन्त्रकव्रत नामक सप्तम परिच्छेद की हिन्दी समाप्त हुई ॥ ७ ॥ — ❦ —