सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टमः परिच्छेदः १६५ आद्यस्य चक्रशङ्खौ द्वौ ध्येयावंसद्वयोपरि। स्कन्धसूत्रसमस्थेन दक्षिणेन तु पाणिना॥ १६ ॥ गृहीता मुष्टिबन्धेन विश्रान्ता पीठपृष्ठतः। ध्येया गदा द्वितीयस्य तथाभूते करे परे॥ १७ ॥ संस्मरेद्धेतिराड् दीप्तं लीलाक्षेपक़रोद्यतम्। एवं प्रद्युम्ननाथस्य व्यत्ययेन तु ते उभे॥ १८ ॥ दक्षिणोत्तरहस्ताभ्यां श्रोत्रमण्डलसम्मुखौ। शङ्खपद्मौ चतुर्थस्य तथाकृष्टौ तु संस्मरेत्॥ १९ ॥ किन्तु वै पङ्कजं नालमस्य वै पाणिपृष्ठगम्। वासुदेवादिमूर्तिध्यानप्रकारमाह— द्विभुजा इत्यारभ्य पाणिपृष्ठगमित्यन्तम्॥ १४-२०॥ अब वासुदेवादि मूर्तियों का ध्यान कहते हैं—ये सभी दो भुजा वाले हैं। सैकड़ों सूर्य के समान प्रकाशमान हैं। इनके तेज तथा सितादि स्वरूप से भेद है। भगवान् वासुदेव के दाहिने और बायें हाथ में तर्जनी और मध्यमा अङ्गुलियों में दोनों कन्धों के ऊपर स्थित चक्र और शङ्ख का ध्यान करे। स्कन्ध सूत्र के साथ स्थित दाहिने हाथ से गृहीत मुष्टिबन्ध में रहने वाली पीठ से पीछे सङ्कर्षण के गदा का ध्यान करे और इसी प्रकार अन्य हाथ में लीलापूर्वक हाथ से प्रक्षेपण के लिये उद्यत जाज्वल्यमान चक्र का भी स्मरण करे। इसी प्रकार भगवान् प्रद्युम्न के व्यत्यस्त हाथों में स्थित उन दोनों का (गदा और चक्र) का स्मरण करे। चतुर्थ अनिरुद्ध के दोनों हाथों में क्षोभमण्डल के सामने स्थित शङ्ख एवं पद्म का स्मरण करे। किन्तु पङ्कज का नाल इनके पीछे है ऐसा स्मरण करे॥ १४-२०॥ वासुदेवादीनां हृदयाद्यङ्गमन्त्र बीजकथनम् हकारं च सकारस्थं कृत्वा षोढा निवेश्य च॥ २० ॥ द्वितीयतुर्यषष्ठाष्टद्विष्ट्कदशकैः क्रमात्। स्वरैर्नियोजयेद् विद्धि हृदाद्यान्नेत्रपश्चिमान्॥ २१ ॥ चातुरात्मीयमन्त्राणां साधनत्वेन सर्वदा। अथ वासुदेवादीनां चतुर्णामपि साधारणानि हृदयाद्यङ्गमन्त्रबीजान्याह—हकार- मिति द्वाभ्याम्। हकारं सकारस्थं कृत्वा षोढा विलिख्य द्वितीयतुर्यषष्ठाष्टद्विष्ट्क- दशकैः स्वरैः, आकारेण ईकारेण ऊकारेण ॠकारेण ऐकारेण लृकारेण च क्रमेण योजयेत्। तथा च ह्सां ह्सीं ह्सूं ह्सॄं ह्सैं ह्सॢं इति बीजषट्कं भवति। एतद् हृदादिनेत्रमन्त्रषट्के क्रमाद् योजयेत्। एवं कवचमन्त्रादिबीजत्रयेऽष्टम- द्वादशदशमस्वराणां संयोजनं क्वाचित्कम्, न सार्वत्रिकम्। यतोऽत्रैव नृसिंहकल्पे—