भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 223

१६४ सात्वतसंहिता ननु मकारस्य जीवबीजत्वं युक्तं प्रसिद्धं च, सकारस्य जीवबीजत्वं कथमिति चेदुच्यते— त्रिधा हकारं कृत्वादौ जीवबीजं तथैव च ॥ ककारं च क्षकारं च लिखेत् तद्वत् त्रिधा त्रिधा । (८।२२-२३) इति वक्ष्यमाणश्लोकस्थितजीवबीजशब्दस्य पारमेश्वरे— नवमं चाष्टमं नेमावराद्यं मातृकान्तिमम् ॥ त्रिधैकैकं क्रमात् कृत्वा बीजद्वादशकं यथा । (२४।७७-७८) इति सकारपरत्वं सुस्पष्टं व्याख्यातं पश्यतु भवान् । किञ्च, वासुदेवाख्यया होऽभूत् साख्यः सङ्कर्षणोदयः ॥ प्रद्युम्नः षाख्यया ज्ञेयो ह्यानिरुद्धस्तु शाख्यया । (१९।३१-३२) इति लक्ष्मीतन्त्रोक्तरीत्या सकारस्य सङ्कर्षणबीजत्वाद् जीवबीजत्वव्यवहारः । जीवाधिष्ठातृत्वात् सङ्कर्षणस्य जीवव्यवहारः "वासुदेवात् सङ्कर्षणो नाम जीवो जायते" (२।२।३९ श्रीभाष्ये) इत्यत्र प्रसिद्धः । तथा च श्रीमद्भाष्ये— "अत्र जीवमनोऽहङ्कारतत्त्वानामधिष्ठातारः सङ्कर्षणप्रद्युम्नानिरुद्धा इति तेषामेव जीवादिशब्दैरभिधानमविरुद्धम्" (२।२।४१) इति ॥ १०-१४ ॥ फिर उससे (चार मूर्तियाँ हैं । अतः उनको एक-एक बार प्रणाम करावे । इससे असकृत् प्रणाम की सिद्धि नहीं होती) श्रद्धाभक्ति पुरःसर साष्टाङ्ग प्रणाम तथा प्रदक्षिणा करावे । इसके बाद व्रत के लिये मन्त्रपूर्वक विधान का उपदेश करना चाहिये । अब वासुदेवादि बीज चतुष्टय कहते हैं—सान्त अर्थात् सकार के अन्त में स्थित हकार, जो षष्ठ स्वर ऊकार से आरूढ़ हो तथा अनुस्वार से विभूषित हो इस प्रकार 'हूँ' यह वासुदेव का बीज है ॥ ११ ॥ वही हकार वर्ण जब जीव (स) बीजस्थ सकारान्वित हो और षष्ठ स्वर (ऊ) रहित होकर द्वितीय स्वर (आ) संयुक्त हो तो इस प्रकार 'हसां' यह सङ्कर्षण बीज निष्पन्न होता है । फिर जब वासुदेव बीज के हकार और ऊकार के मध्य में रेफ् जोड़ देवे तब इस प्रकार 'ह्रूँ' यह प्रद्युम्न का बीज होता है । यह तृतीय बीज सर्व- कामप्रद है । जीवारूढ़ अर्थात् सकार पर आरूढ़ हकार, उसके बाद सान्त (वकार) लिखकर उसे विसर्ग सहित रखे । इस प्रकार 'हस्वँ' यह अनिरुद्ध का बीज होता है । इस प्रकार वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न एवं अनिरुद्ध जो परमात्मा, जीव, मन एवं अहङ्कार के अधिष्ठाता हैं, उनका बीज कह दिया गया ॥ १२-१४ ॥ वासुदेवादिमूर्तिध्यानकथनम् तेजसा त्वत्र भेदोऽस्ति स्वरूपेण सितादिना । दक्षिणोत्तरपाणिभ्यां तर्जनीमध्यमान्तरे ॥ १५ ॥