सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टमः परिच्छेदः १८३ आभूषणों से करे । फिर ताम्रपात्र में सक्तु स्थापित कर निवेदन करे । अर्चन के समाप्त होने पर होम करे ॥ ९२-९५ ॥ तदर्चने च होमान्ते सम्पन्ने सति वै व्रती ॥ ९५ ॥ याते मासत्रये चैव प्रसन्नेऽन्तःस्थितेऽच्युते । गुरुमूर्तिगतो देवः पूजनीयश्च भक्तितः ॥ ९६ ॥ वस्त्रैर्विलेपनैर्माल्यैः कटकैरङ्गुलीयकैः । यथाशक्ति विना शाठ्यं पारणे पारणे ततः ॥ ९७ ॥ प्रीणयेद् वासुदेवं च मूर्तित्रयसमन्वितम् । ऐहिकान् धर्मकामार्थान् मम यच्छन्तु शक्तयः ॥ ९८ ॥ मोक्षविघ्नोपशमनं नित्यं कुर्वन्तु मूर्तयः । सर्वदा नित्यशुद्धो यः परमात्मा परः प्रभुः ॥ ९९ ॥ पतितस्य भवाम्बोधौ वासुदेवोऽस्तु मे गतिः । कृत्वैवं प्रीणनं सम्यग् वासुदेवस्य भक्तितः ॥ १०० ॥ तन्मूर्तित्रितयस्यापि शक्तित्रययुतस्य च । एवं होमान्ते गोविन्दार्चनप्रारम्भानन्तरं मार्गशीर्षादिमासत्रयकृतप्रसादगुणार्थं विशेषेण गुर्वर्चनम्, पारणानन्तरं प्रणवनमःपूर्वकश्लोकद्वयात्मकमन्त्रेण दक्षिणपाणि- स्थसपुष्पार्घ्योदकेन वासुदेवप्रीणनं चाह—तदर्चन इति षड्भिः । शक्तयः श्रिया- दयस्तिस्र इत्यर्थः । मूर्तयः केशवादयस्त्रय इत्यर्थः ॥ ९५-१०१ ॥ इस प्रकार गोविन्दार्चन आरम्भ के बाद तीन महीने के बीत जाने पर व्रती साधक अपने गुरु का अर्चन करे । यतः गुरु साक्षात् मूर्त्तिगत देवं हैं अतः भक्तिपूर्वक उनका पूजन करना ही चाहिये । वस्त्र, विलेपन, माला, कटक तथा अंगूठी अपनी शक्ति के अनुसार पारण पर उन्हें प्रदान करे, शठता न करे । फिर मूर्त्तिमय समन्वित वासुदेव को भी पूजा से प्रसन्न करे और उनकी शक्तियों से इस प्रकार प्रार्थना करे ॥ ९६-९८ ॥ हे शक्तियों ! मुझे ऐहिक (इस लोक में) धर्म, काम और अर्थ प्रदान कीजिए । मेरे मोक्ष में आने वाले सभी विघ्नों को ये मूर्त्तियाँ शान्त करें, जो परमात्मा नित्य शुद्ध पर प्रभु हैं वह भगवान् वासुदेव संसार समुद्र में गिरे हुए मुझ अशरण की रक्षा करें । इस प्रकार भगवान् वासुदेव को भली-भाँति भक्तिपूर्वक प्रसन्न करे ॥ ९९-१०० ॥ इसी प्रकार श्रियादि तीन शक्तियों को तथा केशवादि तीन मूर्त्तियों को भी प्रसन्न करे ॥ १०१ ॥ अथ त्रितययुक्तस्य द्वितीयस्य महात्मनः ॥ १०१ ॥