भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 247

१८८ सात्वतसंहिता ततः पूर्णाहुतिं दद्यात् पश्चादिदमुदाहरेत् ॥ १२७ ॥ व्रतोत्तमेनानेनाद्य मया भक्त्या कृतेन च। चत्वारो वासुदेवाद्या मूर्तयः शक्तिभिः सह ॥ १२८ ॥ प्रयान्तु प्रीतिमतुलां दिशन्तु भविनोऽभयम्। धन्यं व्रतमिदं पुण्यं संसाराध्वनिवर्तनम् ॥ १२९ ॥ एषां सर्वेषामपि वह्निमध्ये सन्तर्पणम्, ततो गुर्वर्चनम्, ब्राह्मणभोजनम्, अनि- रुद्धप्रीणनम्, पूर्णाहुतिम्, वासुदेवादीनां चतुर्णामपि युगपत् प्रीणनं चाह—तर्पयेदिति चतुर्भिः ॥ १२५-१२९ ॥ इसके बाद गुरु का अर्चन, विशेष रूप से जो पहले कहा गया है उसके अनुसार, करे। फिर ब्राह्मणों को भोजन करावे और उन्हें दक्षिणा प्रदान करे। तदनन्तर 'अनिरुद्धोऽस्तु मे गतिः' यह प्रीणन मन्त्र पढ़कर अनिरुद्ध से प्रार्थना करे। फिर पूर्णाहुति दे कर उसके बाद चारों व्यूह को प्रीणन के लिये यह प्रार्थना करे ॥ १२६-१२७ ॥ भक्तिपूर्वक मेरे द्वारा किये गये इस व्रत से अपनी-अपनी शक्तियों के साथ चारों वासुदेवादि मूर्त्तियाँ अत्यन्त प्रसन्न हो जावें, संसारी मनुष्यों को अभय करें, यह व्रत अनन्त फल देने वाला है। इसमें विघ्न आने पर भी अभय ही रहना चाहिये क्योंकि यह व्रत धन्य है, पुण्यावह है, संसार रूपी मार्ग से निवृत्त करने वाला है ॥ १२८-१२९ ॥ अल्पक्लेशमसङ्कीर्णमनन्तफलदं नृणाम्। नावसादस्त्वतः कार्य एतदाचरणे तु वै॥ १३० ॥ अस्य व्रतस्यासम्पूर्णत्वेऽप्यनन्तफलप्रदत्वान्मध्ये विघ्नान्न भेतव्यमित्याह—धन्य- मिति सार्धेन ॥ १२९-१३०॥ यथोपसदनैः कार्यमध्यमैर्मध्यमैर्जनैः। अशाठ्येन यथाशक्ति त्वारण्यैः कुसुमादिकैः ॥ १३१ ॥ अद्भिर्दूर्वाङ्कुरैः पत्रैर्जपजागरणादिना। दीपेनाभ्युक्षणेनैव मार्जनेनोपलेपनैः ॥ १३२ ॥ इदं व्रतं यथाशक्ति मध्यमकल्पेनाधमकल्पेन वा केवलं पत्रपुष्पफलतोयादिभिर्वा जपजागरणदीपारोपणमार्जनानुलेपनादिकैङ्कर्येण वाऽनुष्ठेयमित्याह—यथोपसदनैरिति द्वाभ्याम् ॥ १३१-१३२ ॥ इस व्रत में क्लेश किञ्चिन्मात्र है। यह व्यापक है और मनुष्यों को अनन्त फल देने वाला है। इसमें दुःख रञ्चमात्र भी नहीं है। यह व्रत यथाशक्ति मध्यम