सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०६ सात्वतसंहिता स्वप्न वृत्ति में एकता है। हे महामते ! इसी प्रकार सुषुप्ति वृत्ति और पिण्डात्म मन्त्र में एकता है। बीज मन्त्र और तुर्यवृत्ति में भी शक्ति का व्यक्तित्व है ॥ ४१-४३ ॥ यद्यपि बीजादि भगवन् मन्त्र में ज्ञान प्रदत्व, भोग-मोक्ष फलप्रदत्व नियम- पूर्वक कहा गया है तथापि सुषुप्ति आदि अवस्था व्यूहादि मन्त्रव्यक्ति के विषय हैं। आद्य चातुरात्म्य (तुर्य व्यूह) केवल विभु (परात्पर) इनके जो चार प्रकार के मन्त्र हैं वे मोक्ष और भूति दोनों प्रदान करते हैं। इसके अतिरिक्त सुषुप्तिव्यूहादि क्रम से कहे गये जो मन्त्र समूह हैं वे भावना के अनुसार अमिश्र (केवल मोक्ष) और मिश्र भोग सहित मोक्ष देने वाले हैं ॥ ४३-४५ ॥ ज्ञात्वैवमर्चयेत् पश्चान्नानामन्त्रैर्महामते ॥ ४६ ॥ गौणमुख्यादिगुह्यैस्तु प्रादुर्भावगणं विभोः । एवं तत्तन्मन्त्रफलभेदादिज्ञानपूर्वकं भगवदर्चनं कुर्यादित्याह—ज्ञात्वेति । प्रादु- र्भावगणं वक्ष्यमाणपद्मनाभाद्यवतारसमूहमित्यर्थः ॥ ४६-४७ ॥ अतः, हे महामते ! गौण मुख्यादि गुह्य स्वरूपों से, वक्ष्यमाण पद्मनाभादि अवतार समूहों का तथा तत्तन्मन्त्र फल भेदादि का ज्ञान कर अनेक प्रकार के मन्त्रों से महाज्योति स्वरूप उस चातुरात्मा की पूजा करे ॥ ४६-४७ ॥ महाज्योतिस्वरूपस्य सह वै चतुरात्मना ॥ ४७ ॥ प्राग् जाग्रत्पदसंस्थस्य लेशेनोक्तं तदर्चनम् । इदानीं सविशेषेण मन्त्रध्यानक्रियान्वितम् ॥ ४८ ॥ प्रवक्ष्यामि समासेन शृणुष्वायतलोचन । परेण भगवता सह जाग्रद्व्यूहस्यार्चनं पूर्वं संग्रहेणोक्तम्, इदानीं सविशेषं वक्ष्यामीत्याह—महाज्योतिरिरिति द्वाभ्याम् । महाज्योतिस्वरूपस्य परस्येत्यर्थः । चतु- रात्मना सह वासुदेवादिचातुरात्म्येन सहेत्यर्थः । “स्वमूर्तिभिरमूर्ताभिरच्युताद्याभिर- न्वितः” (२।७२) इति तत्रापि चातुरात्म्यमुक्तं हि । जाग्रत्पदसंस्थस्य जाग्रद्व्यूह- स्येत्यर्थः । प्राक् पूर्वम्, तदर्चनं तथाविधमर्चनम्, लेशेनोक्तं द्वितीयपरिच्छेदे मानसा- र्चनम्, षष्ठपरिच्छेदे बाह्यार्चनं चोक्तमित्यर्थः ॥ ४७-४९ ॥ पहले जाग्रत्पदस्थ की पूजा के विषय में लेश मात्र अर्चन कहा गया है। अब यहाँ मन्त्र, ध्यान एवं क्रियापूर्वक विशेष रूप से तथा समास रूप से भी कहते हैं—हे आयतलोचन उसे आप सुनिये ॥ ४८-४९ ॥ (द्र. द्वितीय परिच्छेद एवं षष्ठ परिच्छेद) भगवतः प्रादुर्भावरीतिकथनम् विशाखयूपो भगवान् स्वयं विश्वसिसृक्षया ॥ ४९ ॥ अध्यक्षेण स्वरूपेण समुदेत्येक एव हि ।