भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

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२०८ सात्वतसंहिता षाड्गुण्यनिर्मितं विद्धि तत्सर्वं बलसूदन ॥—(१९।३२-३६) इति ॥ ५१-५४ ॥ अब महात्मा विशाखयूप के समस्त उपकरणों को कहते हैं—वे भगवान् विशाखयूप उन आद्य पदस्थ चातुराम्य के तथा आधार में रहने वाले सभी देवताओं की सेवा के साथ उदीयमान हुए हैं। उनके साथ श्री आदि शक्तियों का समूह, लाञ्छन सहित तथा सायुध सितादि कान्तियाँ बीज एवं ज्ञानादि षाड्गुण्य तथा उनमें रहने वाली समस्त शक्तियाँ, अणिमादि समस्त सिद्धियाँ तथा स्थिति, उत्पत्ति, लय तथा उदय नाम वाली चातुरात्मीया शक्तियाँ, जिसे ईश्वरी शक्ति कहा जाता है, ये सभी उनके उपकरण थे ॥ ५१-५४ ॥ यथार्ककिरणव्रातं त्यक्त्वा तेजःकणो महान् ॥ ५४ ॥ स्वकारणं विना सर्वमापूरयति गोचरम् । स्वातन्त्र्यात् परिपूर्णत्वात् तद्वत् स परमेश्वरः ॥ ५५ ॥ विहाय वासुदेवाद्यं मूर्तिशाखाचतुष्टयम् । वैभवीयस्य यूथस्य पतित्वेनावतिष्ठते ॥ ५६ ॥ सम्भूतिस्थितिसंहारभोगकैवल्यलक्षणम् । प्रेरयन् वै धिया चक्रं पञ्चारमिदमुत्तमम् ॥ ५७ ॥ सूर्यतेजःकणदृष्टान्तपूर्वकं तस्य विशाखयूपस्यैव विभवदेवताधिपत्यमाह— यथे-त्यादिभिः सार्धैः (षड्भिः?त्रिभिः) । एवमेवोपबृंहितं लोकमात्रापि— पुनर्विभववेलायां विना मूर्तिचतुष्टयम् ॥ विशाखयूप एवैष विभवान् भावयत्युत । इति । —(लक्ष्मी० १९।१७-१८) ननु भवता प्रथमपरिच्छेदव्याख्यानप्रकरणे विभवदेवानामनिरुद्धोत्पन्नत्वमुक्तम्, इदानीं विशाखयूपस्य तत्कारणत्वमुच्यते । कथमुभयोरविरोध इति चेत्, सत्यम् । उभयोरभेदेनाविरोधो बोध्यः ॥ ५४-५७ ॥ जिस प्रकार सूर्य की किरणों के समूह को छोड़कर महान् तेजःकण अपने कारण के बिना भी सभी गोचर जगत् को अपने वैभव से पूर्ण कर देता है, उसी प्रकार वह विशाखयूप भगवान् भी वासुदेवादि मूर्त्ति शाखा चतुष्टय को छोड़कर स्वतन्त्र एवं परिपूर्ण होने से वैभवीय यूप के अधिपति होकर स्थित हो जाते हैं। वे अपनी बुद्धि से, जगत् की संभूति, स्थिति, संहार, भोग एवं कैवल्य प्रदान करने वाले इस उत्तम चक्र को प्रेरित करते हैं ॥ ५४-५७ ॥ स्मर्त्तव्यः स्वपदस्थः स स्वबीजेनामलात्मना । आमूर्धतोऽङ्घ्रिपर्यन्तं तदीयं गात्रमण्डलम् ॥ ५८ ॥