भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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नवमः परिच्छेदः २०९ रत्नवद् वैभवीयैस्तु बीजैर्भाव्यमलङ्कृतम् । क्रमादुच्चार्यमाणैस्तैरमृतौघेन पूर्ववत् ॥ ५९ ॥ पूजनात् परमेशत्वमचिरादेव गच्छति । विशाखयूपस्य तद्बीजेन स्वपदे ध्यानम्, पद्मनाभादिबीजैस्तदीयगात्रालङ्करण- ध्यानम्, तदर्चनफलं चाह—स्मर्त्तव्य इति सार्धद्वाभ्याम् ॥ ५८-६०॥ अतः उन विशाखयूप का उनके अमलात्मा बीज से ध्यान करे । पद्मनाभादि बीज से अलङ्कृत तथा वैभवीय रत्न बीज से जड़ित शिर से लेकर पाद पर्यन्त उनके गात्र का ध्यान करे । उन अमृत समूह बीजों का उच्चारण करने मात्र से तथा पूजन करने से वह साधक थोड़े ही दिनों में परमेश्वर को प्राप्त कर लेता है ॥ ५८-६० ॥ शृणु तद्बीजनिचयं सावधानेन चेतसा ॥ ६० ॥ तत्प्रसादात् परां सिद्धिं प्रयान्ति भगवन्मयाः । शुचौ देशे मनोज्ञे च सुलिप्ते पुष्पभूषिते ॥ ६१ ॥ चन्दनक्षोदसंयुक्ते सुधूपेनाधिवासिते । विलिख्य मातृकाचक्रं भेदेनानेन वै पुनः ॥ ६२ ॥ येन सन्दृष्टमात्रेण शतधा याति कल्मषम् । प्रागादौ पञ्चवर्गान्तं मध्यान्तं मध्यतो लिखेत् ॥ ६३ ॥ यादयो नव नाभिस्था आदयः षोडशारगाः । कादयो नेमिगाः सर्वे पूर्वचक्रे यदक्षगम् ॥ ६४ ॥ तदस्मिन् प्रधिभूतं तु पूजयेद् विधिना ततः । शब्दब्रह्ममयं चक्रमर्घ्यपुष्पादिकैः क्रमात् ॥ ६५ ॥ विभवदेवबीजोद्धरणार्थं वर्णचक्ररचनां तदर्चनं चाह—शृण्विति सार्धैः पञ्चभिः । वर्गान्ता ङकारञकार णकारनकारमकारा इत्यर्थः । यादयो नव यका- रादिक्षकारान्ताः । पूर्वचक्रे द्वितीयपरिच्छेदोक्ते चक्रे । अक्षगं यद्वर्णं प्रणव इत्यर्थः ॥ ६०-६५ ॥ हे सङ्कर्षण ! अब उन बीज समूहों को सावधान चित्त होकर सुनिए, जिसके वृक्ष से वैष्णव साधक भगवन्मय शीघ्र सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं । किसी पवित्र प्रदेश में जो मनोज्ञ हो, उपलिप्त हो, पुष्पों से भूषित हो, चन्दन के जल से उक्षिप्त हो, सुन्दर धूप से धूपित हो इस प्रकार के स्थान पर भेद सहित मातृका चक्र लिखे । जिसके दर्शन मात्र से पाप खण्ड-खण्ड हो जाते हैं ॥ ६०-६१ ॥ वर्गान्त ङकार, ञकार, णकार, नकार और मकार इन पाँचों वर्गान्तों को पूर्व में लिखे । मध्य में मध्यान्त वर्णों को लिखे । नाभि पर यकारादि नव वर्ण लिखे । अकारादि सोलह स्वर वर्ण अरे पर लिखे । सभी ककारादि वर्णों को नेमि पर लिखे

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