भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

पृष्ठ 279, कुल 837 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 279

२२० सात्वतसंहिता मूर्तैर्ध्वजादिकैः सर्वैरावृतस्तत्परायणैः ॥ १०१ ॥ तत्पद्मनाभरूपं विशिनष्टि—धरेति सार्धैस्त्रिभिः । धराम्बुहुतभुग्वातमूलनाल- दलोदरे चतुस्तत्त्वमये पृथिवीतत्त्वस्य मूलत्वम्, अप्तत्त्वस्य नालत्वम्, तेजस्तत्त्वस्य दलत्वम्, वायुतत्त्वस्य कमलोदरत्वं च क्रमेण ज्ञेयम् । गगनैकार्णवोदरे आकाश- तत्त्वात्मकसमुद्रमध्य इत्यर्थः । मानसेऽनन्तशयने मनस्तत्त्वात्मकनागपर्यङ्क इत्यर्थः । दिव्यबोधतनुः बुद्धितत्त्वात्मकदिव्यशरीर इत्यर्थः । उत्तानस्थः उत्तानशायीत्यर्थः । तदीये नाभिपुष्करे प्रकृतितत्त्वात्मकनाभिपद्म इत्यर्थः । विद्यां चतुर्मुखमूर्त्तिरूपां वेद- विद्यामित्यर्थः । तस्य विद्यादेहत्वं प्रतिपादितं खलु जयाख्यादिषु— तन्मध्ये मानवो ब्रह्मा मया सृष्टश्चतुर्मुखः । जगतां प्रभवस्तस्माद् विद्यादेहः सनातनः ॥ (२।२७) इति ॥ ९८-१०१ ॥ मन्त्र मन्त्रेश्वर के न्यास के कारण वह पूज्यता प्राप्त किये हुए है । इस प्रकार सभी सांसारिक वस्तुओं में अन्तर्यामी भाव से स्थित होकर परमेश्वर निष्कल (निराकार) होकर भी साकार रूप धारण करते हैं । यद्यपि भगवान् आप्तकाम हैं किन्तु अपने व्यापार के वशीभूत होकर पद्मनाभ रूप से अपनी शक्ति का सहारा ले कर चतुस्तत्त्वमय धरा, जल, अग्नि एवं वायु रूप मूल, नाल एवं दल के उदर में, गगन रूप एकार्णव उदर वाले पद्म में, मनस्तत्त्वात्मक नाग के पर्यङ्क पर दिव्यज्ञान शरीर धारण कर सहस्रों सूर्य के समान प्रकाशित हो कर अपनी लीला से उत्तान पड़े रहते हैं । अर्थात् यहाँ चार तत्त्वों में पृथ्वी मूल है, जल तत्त्व नाल है, तेजस तत्त्व कमल दल है, वायुतत्त्व कमलोदर है, आकाशतत्त्व समुद्र मध्य है । उनकी नाभि पुष्कर में प्रकृति तत्त्वात्मक नाभि पद्म उत्पन्न हुआ है वे मनस्तत्त्वात्मक नाग पर्यङ्क पर लीलापूर्वक उत्तान सोये हुए हैं ॥ ९६-१०० ॥ वे अपनी शक्ति से शक्ति स्वरूपा महाविद्या को वहन कर रहे हैं । वे विद्या में परायण सभी मूर्त्ति ध्वजादिकों से घिरे हुए हैं ॥ १०१ ॥ अनन्तचेष्टस्य विभोरित्येवं त्वीश्वरात्मनः । भोगापवर्गदं रूपं शान्तव्यक्तं च वैभवम् ॥ १०२ ॥ प्राग्वत् तुर्यपदावस्थं स्मरेद् हृत्कमलाम्बरे । एवं पद्मनाभरूपस्य हृदयकमले ध्यानस्थानमाह—अनन्तेति सार्धेन । शान्तं निराकारम्, अन्तर्यामिभावेन स्थितमिति यावत् । व्यक्तं साकारमित्यर्थः । साकारत्वेन निराकारत्वेनोभयथापि ध्येयमिति भावः । प्राग्वत् तुर्यपदावस्थं द्वितीयपरिच्छेदोक्त- रीत्या (२।६९) नादावसानगगनस्थितमित्यर्थः ॥ १०२-१०३ ॥ तदधः कर्णिकामध्ये त्वभिजातोत्यलद्युतिम् ॥ १०३ ॥ दिशो दश द्योतयन्तं नानागात्ररुहैश्चितम् ।