भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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नवमः परिच्छेदः २२१ सौम्यं द्विरष्टवर्षं च राजीवदललोचनम् ॥ १०४ ॥ भचक्रचक्रभृद्देवं गदादेहं तथैव च। शक्तिमाधारसंज्ञां च प्रोद्वहन्तं स्मरेद् ध्रुवम् ॥ १०५ ॥ स्थितो यः स्तम्भभूतस्तु अस्मिन् वै विश्वमन्दिरे । नभोऽनिलात्मना चैव भूमिकाभिन्नलक्षणे ॥ १०६ ॥ तदधः कर्णिकामध्ये सुषुप्तिस्थाने ध्रुवस्य ध्यानप्रकारमाह—तदध इति सार्धैस्त्रिभिः । नायं प्रसिद्धोऽर्वाचीनो ध्रुव इति मन्तव्यः । अपि तु तस्यापि ध्रुवत्व- प्रदः । साक्षाद् भगवद्रूपोऽन्य इति बोध्यम् । तथा च सहस्रनामभाष्ये"अतिशयेन धीयते बद्ध्यतेऽस्मिन् ज्योतिश्चक्रमिति व्यवसायः, ..... नक्षत्राधारव्योमशरीर- त्वात् । अतो हि "गगनमूर्तये" (सा० २३।४४) इति मन्त्रवर्णः । "भचक्रचक्र- भृद्देवम्" (सा० ९।१०५) इति हि ध्यानम् । सर्वमस्मिन् संतिष्ठते समाप्यत इति संस्थानः । स एव "परमपदप्राप्तिहेतुः" (सा० २३।४५) इति मन्त्रवर्णात् स्थानदः । स खलु तुङ्गपदप्रदानेनार्वाचीनं ध्रुवमपि ध्रुवीचकार, अतो ध्रुवः" (पृ० ३६४-३६६) इति ॥ १०३-१०६ ॥ अनन्त चेष्टा वाले ईश्वरात्मा उन विभु का वैभव-स्वरूप भोग एवं अपवर्ग देने वाला है और शान्त (निराकार) व्यक्त साकार है । इस प्रकार तूर्य पदावस्थ उनको साकार निराकार दोनों रूप का ध्यान करना चाहिये ॥ १०२-१०३ ॥ इस प्रकार कर्णिका के मध्य में सुषुप्ति स्थान में अत्यन्त मनोहर कमल के समान अपनी कान्ति से दशों दिशाओं को प्रकाशित करते हुए सौम्य-स्वरूप सोलह वर्ष की अवस्था वाले, कमल के समान नेत्रों से युक्त, नक्षत्र चक्र में चक्र धारण किये हुए, गदा धारण किये हुए, उसी प्रकार अपनी शक्ति तथा आधार संज्ञा को धारण किये हुए ध्रुव स्वरूप भगवान् का ध्यान करे ॥ १०२-१०५ ॥ नभ, वायु और भूमि से अभिन्न लक्षण वाले इस विश्वमन्दिर में खम्भे की तरह वे अडिग स्थित है ॥ १०६ ॥ प्रागादावीशकोणान्तं संस्मरेत् कर्णिकोपरि । द्विषट्कं यदनन्ताद्यं सरश्शाय्यन्तमग्निगम् ॥ १०७ ॥ तस्मिन्नेव स्थाने प्रागादीशानान्तमन्नतादिद्वादशमूर्तिध्यानं कार्यमित्याह— प्रागादाविति । अग्निगम् = अग्निमण्डलस्थमित्यर्थः ॥ १०७ ॥ अब ऐसे स्थान में पूर्व से ईशानादि क्रम से द्वादश मूर्तियों का ध्यान करे, इस बात को कहते हैं—पूर्व से आरम्भ कर ईशानकोण पर्यन्त कर्णिका पर सरश्शायी अग्नि के मण्डल में स्थित बारह संख्यक अनन्तादि का ध्यान करे ॥ १०७ ॥

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