सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
पृष्ठ 285, कुल 837 में से
संदर्भ में पढ़ें२२६ सात्वतसंहिता उसके पश्चात् केशर कोटि में उसके आगे दलान्तस्थ सोलह पुष्टि मन्त्रों से न्यास करे। फिर दलाग्रस्थ शङ्खादि शक्ति पर्यन्त का न्यास करे। फिर मन्त्र के ऊपर मध्य में पूर्ववत् पातालशायी का, फिर पाताल सिद्धियों के आलयभूत पद देवता का ध्यान करे। उसकी शक्ति से अनुगृहीत कर्णिकागत अङ्गसंज्ञक मन्त्रेश समस्त सिद्धियों को देने में समर्थ हो जाता है ॥ १२६-१२८ ॥ एवमेव भुवर्लोकसिद्धीनां प्राप्तये सदा। स्मर्य ऊर्ध्वे सरश्शायी त्वनन्तः कमलादधः ॥ १२९ ॥ अथ भुवर्लोकसिद्ध्यर्थमर्चने विशेषमाह—एवमिति। सरश्शायी एकार्णवशाय इत्यर्थः ॥ १२९ ॥ अब भूलोक की सिद्धि के लिये विशेष अर्चन कहते हैं—इसी प्रकार भुव लोक की सिद्धि के लिये सदा ऊपर एकार्णवशायी अनन्त का तथा नीचे कमलादि का यजन करे ॥ १२९ ॥ यजेद् गगनसिद्धीनामशेषाणामथाप्तये। खस्थं न्यग्रोधशयनं कूर्मं कमलमूलगम् ॥ १३० ॥ सुवर्लोकादीनां सिद्ध्यर्थमर्चने विशेषमाह—यजेदिति। खस्थं कर्णिकामध्य- गतलक्ष्मीयन्त्रस्योपरि स्थितमित्यर्थः ॥ १३०॥ सुवर्लोक की सिद्ध के लिये विशेष पूजन—कर्णिका मध्यगत लक्ष्मी यन्त्र के ऊपर स्थित कमल मूल में स्थित कूर्म भगवान् का यजन करे ॥ १३० ॥ एतेषामपि सञ्चारं नानासिद्धिव्यपेक्षया। प्रधानमन्त्रवत् कुर्यात् प्राग्वत् सर्वत्र सर्वदा ॥ १३१ ॥ एवं लक्ष्मीमन्त्रवत् पुष्याद्यङ्गमन्त्राणामपि तत्तत्फलप्राप्तीच्छया प्राधान्येनार्चनं कुर्यादित्याह—एतेषामिति ॥ १३१ ॥ लक्ष्मी मन्त्र के समान पुष्पादि अङ्गमन्त्रों की भी उन उन फलों के प्राप्ति की इच्छा से प्राधान्येन अर्चन करना चाहिये ॥ १३१ ॥ एवमाद्यैस्तु विधिवद् भोगैर्नानाविधोत्थितैः । यः स्थितस्त्रिविधे सर्गे विभवः पारमेश्वरः ॥ १३२ ॥ उक्तमर्थं निगमयति—एवमिति ॥ १३२ ॥ इस प्रकार नानाविध भोगों तथा मोक्षों से युक्त होकर जो तीनों लोकों में विधिवत् स्थित है वही पारमेश्वर विभव है ॥ १३२ ॥ पौष्कराख्ये च वाराहे प्राजापत्ये महामते ।