भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

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पृष्ठ 319

२६० सात्वतसंहिता चातुरात्म्यसमूहं तु यत्पद्मदलभूस्थितम्। तथा विभवदेवानां मध्यात् पद्मदलेक्षण ॥ एकस्त्वनुग्रहार्थं तु शक्त्यात्मा भावितात्मनाम्। बिभर्ति बहुभेदोत्थं रूपं सद्वाहनस्थितम्॥ (१२।१७५-१७६) इति । अंशावतारत्वमेवोक्तमस्य सहस्रनामभाष्ये—“अथांशावतारा युगा- नुसारिकान्तिश्चेति । एवं व्याप्तिनियमनादिशक्तिद्वारा विश्वस्य व्याप्तेर्विष्णुः, “सर्व- शक्त्यात्मने” (सा०सं० २३।४८) इति मन्त्रवर्णात्” (पृ० ५३१) इति । एवं च त्रिमूर्तिष्वयमेकतम इति बोध्यम्, “नारायणावतारो यः शक्तीशो नाम नामतः” (८।१९) इति लक्ष्मीतन्त्रोक्तेः ॥ ९-१९ ॥ अब शक्तीश का ध्यान कहते हैं—उन अंशावतार शक्तीश का ध्यान करना चाहिए; जिनका कमल के समान नेत्र है, जो इच्छानुसार रूप धारण करते हैं, सौम्य तथा प्रहसित मुख हैं, जो भक्तों पर अनुग्रह करने के लिये उन्हें फलादि प्रदान करने के लिये अपने दोनों पैरों से तथा दोनों हाथों को तथा वसुधा को पीड़ित करते रहते हैं । उनकी कान्ति युगानुसार बदलती रहती है । उनकी चार भुजायें तथा मुख हैं । मूर्त रूप से चक्र और गदा हाथ में धारण किये हुए हैं और अमूर्त रूप से जल में उत्पन्न कमल धारण किये हुए हैं । जो चन्द्रमा के समान कान्ति वाले हैं और अपने कमल से सबके सन्ताप को शमन करते हैं । इतना ही नहीं जो अमलात्मा महात्माओं में नानामन्त्रमयी विद्या प्रकाशित करते हैं । जो वाक्पति शब्दमूर्ति शङ्ख से प्रेरित होने पर आज्ञा प्रतीक्षक के समान अपनी गदा तथा अपने चक्र इन दोनों से साधुओं को सन्ताप देने वालो को नष्ट कर देते हैं और अपने नरसिंह के मुख से सारे संसार का भय दूर करने वाले है । अमृतात्मना अपने वाराहमुख से सारे प्राणियों का पोषण करते हैं । पश्चिमस्थ कापिल मुख (अग्नि) से सब का उपसंहार करते हैं । भक्ति और श्रद्धा युक्त अमलात्मा महात्माओं द्वारा स्मरण किये जाने पर हृदय के मध्य में, आकाश मण्डल में, भूमि में, आग के मध्य में तथा ब्राह्मणादि चारों वर्णों पर अनुकम्पा के लिये अपने चातुरात्म्य रूप से चार प्रकार से प्रगट हो जाते हैं । जो शङ्ख, पद्माङ्कित अपने शरीर के समान जो बिना मुख के भी मूर्त्तिमान हलादि से युक्त होकर वर्णानुरूप वर्ण से, सम रूप से अथवा विषम रूप से अन्योन्यानुगत के समान पूर्वोद्दिष्ट रूप से प्रगट हो जाते हैं ॥ ९-१९ ॥ २. मधुसूदनध्यानकथनम् प्रलयानलसूर्याभः स्मर्त्तव्यो मधुसूदनः । अष्टबाहुर्विशालांसोऽप्यग्निष्टोमकराङ्कितः ॥ २० ॥ शङ्खचक्रधरश्चैव बाणकार्मुकधृक् तथा। रजस्तमोभ्यां मूर्त्ताभ्यां सम्प्रवृत्तिनिवृत्तये ॥ २१ ॥