भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

पृष्ठ 323, कुल 837 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 323

२६४ सात्वतसंहिता भासयन्तं जगन्नाथं स्मरेद् हृत्कमलादिषु । अथ विश्वरूपध्यानमाह—योऽन्तः सर्वेश्वरो देव इत्यारभ्य स्मरेद् हृत्कमलादि- ष्वित्यन्तम् । प्राङ्मुखस्य पौरुषस्य वक्त्रस्योर्ध्वं ब्रह्मादिश्रुत्यन्तवक्त्राष्टकम्, दक्षिणस्य नारसिंहवक्त्रस्योर्ध्वं पिशाचादि(वारि)पर्यन्तवक्त्रसप्तकम्, पश्चिमस्य कपिलवक्त्र- स्योर्ध्वं पातालादितारान्तवक्त्रसप्तकम्, औत्तरस्य वाराहवक्त्रस्योर्ध्वं यक्षादिगोगणा- न्तवक्त्रसप्तकम्, आहत्य त्रयस्त्रिंशद्वक्त्राणि ज्ञेयानि । तारासमेतैरित्यत्र ताराशब्देन अश्विन्यादिप्रधाननक्षत्राणि, नक्षत्रशब्देन तदन्यानि नक्षत्राणि ज्ञेयानि, अन्यथा पौन- रुक्त्यात् । एवं वारिभिरित्यत्र वारिधिर्विवक्षणीयः । अम्बुशब्देन केवलमुदकं विवक्षणीयम् । नागाद्यैरित्यत्र नागानामाद्यः प्रथमोऽनन्त इत्यर्थः । चातुरात्मीयं वासु- देवादिव्यूहीयमित्यर्थः । पद्माद्यमस्त्राणां दशकं पद्मशङ्खचक्रगदाखड्गलाङ्गुलमुसल- शरशार्ङ्गखेटाख्यमायुधदशकमित्यर्थः । एतेषामायुधानां पूर्वं जाग्रद्व्यूहवासुदेवचतुर्मूर्ति- लाञ्छनत्वेनोक्तत्वाच्चातुरात्मीयत्वं सुस्पष्टम् । लोकेशास्त्राष्टकं तु वज्रशक्त्यादिकं प्रसिद्धमीश्वरादिषु (९।११६-११७) प्रतिपादितं च । विश्वरूपस्थानं तु श्रीपौष्करे— श्वेतद्वीपे कुरुक्षेत्रे हिमवन्ताचलेऽब्जज । वेदिकायामपि तटे विश्वरूपः स्थितः प्रभुः ॥ (३६।३३७) इति ॥ २६-४०॥ अब विश्वरूप का ध्यान कहते हैं—जो सर्वेश्वर सभी के अन्तःकरण में साक्षात् रूप से स्थित है, स्फटिक मणि के समान स्वशक्ति से उठे हुए भावों को धारण करते हैं, अविद्याग्रस्त भक्तों को सन्मार्ग बताने के लिये जो उद्यत रहते हैं, जो स्थूलतर आत्माओं के बाहर हैं और जो द्यावापृथिवी के अन्तराल हैं, ऐसे अनादि जगन्नाथ का विश्वरूप के रूप में स्मरण करे । जो अनेक मुख, अनेक चरण और अनेक हाथों वाले हैं । अनेक मकर चिह्नों से युक्त हैं । यद्यपि उनके अनेक मुख हैं और अनेक भुजाओं से वे भूषित हैं, फिर भी वे मुख्य रूप से विविधाकार तैंतीस मुखों से युक्त है तथा ४४ दिव्य भुजाओं वाले है ॥ २७-३० ॥ उनके पूर्व स्थित पौरुष वक्त्र के ऊपर ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र, दक्ष, अर्क, चन्द्रमा, सिद्ध तथा श्रुति ये आठ देवता स्थित हैं । दक्षिण नारसिंह वक्त्र के ऊपर पिशाच, अग्नि, मरुत्, शैल, द्वीप, गन्धर्व और वारि ये सात देवयोनियाँ स्थित हैं । पश्चिम कपिल वक्त्र के ऊपर पाताल, दिक्, महामेघ, लोक, राशि, ग्रह एवं तारादि सात मण्डल स्थित हैं । उत्तर वाराह वक्त्र के ऊपर यक्ष, अन्तक, अम्बु, नाग, वसु, नक्षत्र और गोगण ये सात स्थित हैं । तारा, नक्षत्रादि मिलाकर कुल ३३ वक्त्र हो जाते हैं । वासुदेवादि चार व्यूह और पद्मादि दश, अस्त्र, वासुदेवादि चतुर्मूर्ति, लाञ्छन, लोकेश, अस्त्राष्टक, वज्रादि, पुस्तक, अक्षसूत्र, दर्वी, कमण्डल, अभय, वर, दर्भ, अजिन, मनोहर छत्र, श्वेत चामर, स्रुक्-स्रुवा, दो कलश, वेदी, वह्नि, पूर्ण चन्द्रार्क मण्डल, नागेन्द्र, मणिदर्पण, पुष्पमाला, दिव्य व्यञ्जन, विश्वपत्र तथा लता—ये सभी भगवान् की भुजाओं में यथास्थान सन्निविष्ट