भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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द्वादशः परिच्छेदः २६५ हैं। अतः इन सभी से समन्वित भगवान् की भुजा का स्मरण करे। जैसा कहा गया है साधक उसी प्रकार स्मरण करे, जिससे व्यत्यय न हो। इस प्रकार जो शरीर से उठी हुई अपनी नाना प्रकार की कान्ति से सारे जगत् को भासित करते हैं ऐसे जगन्नाथ का हृदय-कमल आदि में ध्यान करे ॥ २४-४० ॥ ६. हंसध्यानकथनम् हंसमूर्तिमथात्मानं ज्ञानयज्ञभुजं स्मरेत् ॥ ४० ॥ कुन्देन्दुस्निग्धकान्तिं च हेमतुण्डं महातनुम् । रजस्तमोऽङ्घ्रिं सत्सत्त्वविग्रहं परमेश्वरम् ॥ ४१ ॥ धर्माधर्मेक्षणं ध्यायेदग्नीषोमात्मकेन तु । दक्षिणोत्तरसंस्थेन पक्षयुग्मेन राजितम् ॥ ४२ ॥ बहिस्तमेवोदकस्थं तुहिनाचलसन्निभम् । ध्यात्वाऽर्चयेत् तु विधिवद् हंसविग्रहमच्युतम् ॥ ४३ ॥ अथ हंसध्यानमाह—हंसेति सार्धैस्त्रिभिः । अस्य स्थानं तु श्रीपौष्करे— "सिद्धामरार्चितं विद्धि श्वेतद्वीपे तु हंसराट्" (३६।३१७) इति ॥ ४०-४३ ॥ अब हंस स्वरूप का ध्यान कहते हैं—ज्ञान रूप यज्ञ की भुजा वाले, कुन्द इन्द्र के समान श्वेत कान्ति वाले, स्वर्ण के समान तुण्ड से युक्त एवं रज-तम स्वरूप चरणों वाले, सत्सत्त्व विग्रह वाले, धर्मा-धर्म नेत्रों वाले, दक्षिण-उत्तर अग्निषोमात्मक दो पक्षों से सुशोभित, उदक में निवास करने वाले, हिमालय के समान सर्वत्र श्वेत वर्ण उन परमेश्वर हंस रूप विग्रह वाले अच्युत का विधिवत् ध्यान कर साधक को पूजन करना चाहिये ॥ ४०-४३ ॥ ७. वराहध्यानकथनम् बहिर्द्रव्यमयस्त्वेकः सामान्येनैकलक्षणः । सम्यङ्‌निर्वर्तितः स्वर्गं पूर्वमृच्छति चार्थिनाम् ॥ ४४ ॥ अन्तर्वेद्यां चतुर्था यस्त्वेक एव महामखः । तपोयागजपध्यानस्वरूपः शश्वदेव हि ॥ ४५ ॥ याजिनामपवर्गं तु विदधाति समापनात् । तं यज्ञपुरुषं ब्रह्म वासुदेवमजं हरिम् ॥ ४६ ॥ ध्यायेद् वै सूकारात्मानमञ्जनाद्रिसमप्रभम् । यज्ञाङ्गचिह्निताङ्घ्रिं च महाव्याहृतिदंष्ट्रिणम् ॥ ४७ ॥ भूर्भुवः स्वः शरीरं च शब्दब्रह्मैकमानसम् । निर्णुदन्तं प्रपन्नानामविद्यापङ्कमञ्जसा ॥ ४८ ॥ सा० सं० - 21