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सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 325

२६६ सात्वतसंहिता वैद्येन पोत्रप्रान्तेन त्वक्षयेनामलेन च। अथ वराहध्यानमाह—बहिर्द्रव्यमय इत्यादिभिः । वैद्येन = विद्यामयेन । पोत्र- प्रान्तेन वराहवक्त्राग्रेणेत्यर्थः । एवं यज्ञाङ्गदेहत्वं विष्णुपुराणेऽपि स्पष्टमुक्तम्— पादेषु वेदास्तव यूपदंष्ट्र दन्तेषु यज्ञाश्चितयश्च वक्त्रे । हुताशजिह्वोऽसि तनूरुहाणि दर्भाः प्रभो यज्ञपुमांस्त्वमेव ॥ विलोचने रात्र्यहनी महात्मन् सर्वात्मकं ब्रह्मपदं शिरस्ते । सूक्तान्यशेषाणि सटाकलापो घ्राणं समस्तानि हवींषि देव ॥ स्रुक्तुण्ड सामस्वरधीरनाद प्राग्वंशकायाखिलसत्रसन्धे । पूर्तेष्टधर्मश्रवणोऽसि देव सनातनात्मन् भगवन् प्रसीद ॥ इति । —(१।४।३२-३४) अस्य स्थानं तु श्रीपौष्करे— "सौकरीयेन रूपेण क्षेत्रे तत्संज्ञके तु वै" (३६।३१९) इति ॥ ४४-४९ ॥ बाहर से एकद्रव्यमय, सामान्य रूप से एक लक्षण वाले, जो अर्थी जनों के लिये पूर्व में स्वर्ग का निर्माण कर देते हैं, जो हैं तो एक ही महामख किन्तु अन्तर्वेदी में होतादि चार स्वरूप हो जाते हैं। जो निरन्तर तप, याग, जप, ध्यान स्वरूप वाले हैं, जो समापन होने पर यज्ञ कर्त्ताओं को अपवर्ग प्रदान करते हैं। उन यज्ञ पुरुष, ब्रह्मस्वरूप अज, हरि, वासुदेव, अञ्जन-पहाड़ की तरह कान्तिमान सूकर शरीरधारी भगवान् का ध्यान करे। जिनका पैर यज्ञाङ्ग से चिह्नित है और महाव्याहृतियाँ जिनकी दंष्ट्रा है, भूर्भुवः स्वः जिनका विग्रह है, एक शब्द-ब्रह्म ही जिनका मन है, जो शरणागतों के अविद्या रूप पङ्क को अपने अक्षय एवं अमल वक्त्र के अग्रभाग से अकस्मात् दूर कर देते हैं उन वाराह भगवान् का ध्यान करना चाहिये ॥ ४४-४९ ॥ ८. वडवानलध्यानकथनम् वासनावासितानां च जीवानां भवशान्तये ॥ ४९ ॥ महाविभूतिर्भगवान् पूर्णषाड्गुण्यविग्रहः । स्वकाच्छान्ततराद् ब्रह्मतत्त्वादादाय चाञ्जलिम् ॥ ५० ॥ करोति सेचनं दोषदग्धानां च स्वतेजसा । स्थूलरूपेण तमजं बहिराराधनाविधौ ॥ ५१ ॥ आध्मातं वायुना यद्वन्निर्धूमाङ्गारपर्वतम् । ध्यायेत् तद्वन्महादीपं वाजिवक्त्रमलाच्छनम् ॥ ५२ ॥ बद्धब्रह्माञ्जलिं कस्थं द्रुतकनकलोचनम् । घोणाग्रेणाहरन्तं च त्रैलोक्योत्थं जलेन्धनम् ॥ ५३ ॥

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