भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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स्वशक्तिविभवाधारमिच्छाज्ञानक्रियार्चिषम् ॥ ७१ ॥ नानाविशेषविज्ञानस्फुलिङ्गोर्मिसदोदितम् । दारयन्तं स्थितं हार्दमनूनं मोहमूल्बणम् ॥ ७२ ॥ नदन्नादमनाख्येयं तमजं परमेश्वरम् । वराहध्यानमाह—अतसीपुष्पसंकाश इति त्रिभिः । पूर्वोक्तो वराहस्तु साक्षाद् वराहः, अयं नृवराह इति ध्येयम्, "शङ्खचक्रगदाधरः" (१२।७०) इति ध्यानात्, "कोकामुखे वराहस्तु वाराहे तु नगोत्तमे" (३६।३२४) इति पौष्करे पुनर्वराह- स्थानप्रदर्शनाच्च ॥ ७०-७३ ॥ अब वराह का ध्यान कहते हैं—अतसी पुष्प के समान नीलवर्ण वाले तथा शङ्ख, चक्र एवं गदा धारण किये हुए, जिनके अङ्ग यज्ञ सामग्री से निर्मित हैं, जो डूबे हुए को ऊपर लाने में समर्थ हैं। स्वशक्ति, विभवाधार तथा इच्छा, ज्ञान एवं क्रिया से संयुक्त हैं, अनेक प्रकार के विशेष विज्ञान के स्फुलिङ्ग रूप ऊर्मि से सदा उदीयमान हैं। हृदय में स्थित उल्बण महामोह को उखाड़ कर फेकने में सर्वथा सशक्त हैं, ऐसे वराह भगवान् का ध्यान करना चाहिये ॥ ७०-७३ ॥ १४. नृसिंहध्यानकथनम् निष्प्तकनकाभं च ध्यायेद् देवं नृकेसरिम् ॥ ७३ ॥ ज्वलदग्निस्रफुलिङ्गाभिः स्वदेहोत्थाभिरावृतम् । रथाङ्गशङ्खधातारं बृहन्मूर्तिं सुभीषणम् ॥ ७४ ॥ सत्सत्त्वकरजश्रेणीदीप्तेनोभयपाणिना । संयच्छन्तं धिया सम्यग् भविनां साभयं वरम् ॥ ७५ ॥ अथ श्रीनृसिंहध्यानमाह—निष्प्तेति सार्धद्वाभ्याम् । मूर्तं ब्रह्म साकारं परंब्रह्म- त्यर्थः । ब्रह्ममूर्तिमिति पाठे बृहत्कायमित्यर्थः । सत्सत्त्वकरजश्रेणीदीप्तेनोभयपाणिना साभयं वरं संयच्छन्तं शुद्धसत्त्वमयनखपङ्क्तिरिवाजिताभ्यां कराभ्यामभयवरदमुद्रा- न्वितमित्यर्थः । अस्य स्थानं तु श्रीपौष्करे— नृहरिः कृतशौचे तु उज्जायिन्यामपि द्विज । विशालमूलसंज्ञे तु स्थाने त्वेवं स्थितस्त्रिधा ॥ (३६।२२३) इति । केवलनृसिंहावतारस्थानमपि तत्रैव प्रतिपादितम्— "विन्ध्यारण्ये तु पौष्कर । विज्ञातव्यो मृगेन्द्रात्मा पापहा सर्वदेहिनाम्" (३६।३१८-३१९) इति ॥ ७३-७५ ॥ अब नृसिंह जो अज हैं और अप्रतिम नाद करते रहते हैं, जिनके शरीर की आभा तपाये हुए सुवर्ण की भाँति उद्दीप्त है, जो अपने शरीर से निकली हुई अग्नि को जलती हुई ज्वालाओं से आवृत किए हुए हैं, जो चक्र, शङ्ख धारण किये हुए है, जिनका शरीर अत्यन्त बृहत् तथा भीषण है, जो सत्त्व युक्त, प्रदीप्त

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