सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७२ सात्वतसंहिता नख श्रेणी युक्त, अपने दो हाथों से संसृति मनुष्यों को वर और अभय प्रदान कर रहे हैं, ऐसे नृसिंह भगवान् का ध्यान करना चाहिये ॥ ७३-७५ ॥ १५. अमृताहरणध्यानकथनम् अमृताध्मातमेघाभममृताहरणं विभुम् । पीताम्बरधरं ध्यायेदेकवक्त्रं चतुर्भुजम् ॥ ७६ ॥ श्रोणीतटार्पितकरं शङ्खचक्रविभूषितम् । मध्यतो दक्षिणेनैव वहन्तं गिरिरूपधृक् ॥ ७७ ॥ शुद्धज्ञानानुविद्धं च कर्मसम्भवभीतिहम् । दिशन्तं स्वधिया सम्यग् भक्तानां भक्तवत्सलम् ॥ ७८ ॥ मन्थामथितदुग्धाब्धिं क्षोभयित्वा प्रकाशितम् । अमृतं क्षुत्तृषादीनां प्रतिपक्षमनामयम् ॥ ७९ ॥ शुद्धं चानश्वरं भाव्यं मायाख्यार्णवमध्यगम् । आत्मामृतमनौपम्यम् आहारध्वंसकर्मणा ॥ ८० ॥ अमृताहरणध्यानमाह—अमृतेत्यादिभिः । अस्यं स्थानं तु श्रीपौष्करे— क्षारोदकक्षतिक्षेत्रे सुरासुरनिषेविते । मन्द्राद्रिकरो देवो वर्तते देवपूजितः ॥ तत्रैवामृतजिद् देवः संस्थितः सिद्धसेवितः । कान्तारूपधरश्चैव सुधाकलशधृक् तथा ॥ सिद्धानां च मुनीनां च देवानां मृत्युजित् स्थितः । —(३६।३४४-३४६) इति ॥ ७६-८०॥ अब अमृताहरण का ध्यान कहते हैं—अमृतपूर्ण मेघ के समान गरजते हुए पीताम्बरधारी, एक मुख एवं चार भुजा वाले विभु रूप अमृताहरण का ध्यान करना चाहिये । जो अपने नितम्ब प्रदेश पर बायाँ हाथ स्थापित किये हुए हैं । शङ्ख, चक्र से विभूषित हैं, मन्दराचल का रूप धारण किये हुए है तथा दक्षिण हाथ में अमृत धारण किये हुए है जो अमृत शुद्ध ज्ञान से अनुविद्ध हैं । वह मनुष्यों द्वारा किये गये दुष्कर्म से उत्पन्न भीति को दूर करने वाले हैं । अपने भक्तों को अपनी बुद्धि के अनुसार भक्त वत्सलता स्वरूप अमृत प्रदान कर रहे हैं, उस अमृत रूप दुग्धोदधि को मथानी से मथकर जिन्होनें स्वयं प्रकाशित किया है । वह अमृत भूख प्यास का शत्रु है, अनामय है, शुद्ध है, अनश्वर (नित्य) है, माया नामक समुद्र के मध्य में रहने वाला है, आत्मामृत है, अनुपम है, क्योंकि भूख को सर्वथा सर्वदा के लिये मिटा देता है, ऐसे अमृताहरण विष्णु का ध्यान करना चाहिए ॥ ७६-८० ॥