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सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

२७२ सात्वतसंहिता नख श्रेणी युक्त, अपने दो हाथों से संसृति मनुष्यों को वर और अभय प्रदान कर रहे हैं, ऐसे नृसिंह भगवान् का ध्यान करना चाहिये ॥ ७३-७५ ॥ १५. अमृताहरणध्यानकथनम् अमृताध्मातमेघाभममृताहरणं विभुम् । पीताम्बरधरं ध्यायेदेकवक्त्रं चतुर्भुजम् ॥ ७६ ॥ श्रोणीतटार्पितकरं शङ्खचक्रविभूषितम् । मध्यतो दक्षिणेनैव वहन्तं गिरिरूपधृक् ॥ ७७ ॥ शुद्धज्ञानानुविद्धं च कर्मसम्भवभीतिहम् । दिशन्तं स्वधिया सम्यग् भक्तानां भक्तवत्सलम् ॥ ७८ ॥ मन्थामथितदुग्धाब्धिं क्षोभयित्वा प्रकाशितम् । अमृतं क्षुत्तृषादीनां प्रतिपक्षमनामयम् ॥ ७९ ॥ शुद्धं चानश्वरं भाव्यं मायाख्यार्णवमध्यगम् । आत्मामृतमनौपम्यम् आहारध्वंसकर्मणा ॥ ८० ॥ अमृताहरणध्यानमाह—अमृतेत्यादिभिः । अस्यं स्थानं तु श्रीपौष्करे— क्षारोदकक्षतिक्षेत्रे सुरासुरनिषेविते । मन्द्राद्रिकरो देवो वर्तते देवपूजितः ॥ तत्रैवामृतजिद् देवः संस्थितः सिद्धसेवितः । कान्तारूपधरश्चैव सुधाकलशधृक् तथा ॥ सिद्धानां च मुनीनां च देवानां मृत्युजित् स्थितः । —(३६।३४४-३४६) इति ॥ ७६-८०॥ अब अमृताहरण का ध्यान कहते हैं—अमृतपूर्ण मेघ के समान गरजते हुए पीताम्बरधारी, एक मुख एवं चार भुजा वाले विभु रूप अमृताहरण का ध्यान करना चाहिये । जो अपने नितम्ब प्रदेश पर बायाँ हाथ स्थापित किये हुए हैं । शङ्ख, चक्र से विभूषित हैं, मन्दराचल का रूप धारण किये हुए है तथा दक्षिण हाथ में अमृत धारण किये हुए है जो अमृत शुद्ध ज्ञान से अनुविद्ध हैं । वह मनुष्यों द्वारा किये गये दुष्कर्म से उत्पन्न भीति को दूर करने वाले हैं । अपने भक्तों को अपनी बुद्धि के अनुसार भक्त वत्सलता स्वरूप अमृत प्रदान कर रहे हैं, उस अमृत रूप दुग्धोदधि को मथानी से मथकर जिन्होनें स्वयं प्रकाशित किया है । वह अमृत भूख प्यास का शत्रु है, अनामय है, शुद्ध है, अनश्वर (नित्य) है, माया नामक समुद्र के मध्य में रहने वाला है, आत्मामृत है, अनुपम है, क्योंकि भूख को सर्वथा सर्वदा के लिये मिटा देता है, ऐसे अमृताहरण विष्णु का ध्यान करना चाहिए ॥ ७६-८० ॥

द्वादशः परिच्छेदः २७३ १६. श्रीपतिध्यानकथनम् ध्यायेत् कनकगर्भाभं देवदेवं श्रियःपतिम् । कमलालयहेतीशविभूषितकरद्वयम् ॥ ८१ ॥ द्वयं देवीपरिणये लीलयैव समर्पयन् । प्रकाशयन्ननादित्वमात्मनः प्रकृतेः सह ॥ ८२ ॥ मत्करैरनुविद्धेयं प्रकृतिः प्राकृतैरहम् । यतोऽहमाश्रयश्चास्या मूर्तेर्मय्येतदात्मिका ॥ ८३ ॥ यामालम्ब्य सुखेनेमं दुस्तरं हि गुणोदधिम् । निस्तरन्त्यचिरेणैव व्यक्तं ध्यानपरायणाः ॥ ८४ ॥ श्रीपतिध्यानमाह—ध्यायेदित्यादिभिः । "प्रकृतिर्जगन्माता लक्ष्मीः" (पृ० ३५१) इति सहस्रनामभाष्ये व्याख्यातम् ॥ ८१-८४ ॥ अब श्रीपति का ध्यान कहते हैं—कनक के समान कान्तिमान् देवाधिदेव श्रीपति लक्ष्मीनारायण का ध्यान करना चाहिये, जिनके दोनों हाथ कमलालय, पद्म और हेतीराट् सुदर्शन चक्र से विभूषित हैं ॥ ८१ ॥ भगवान् श्रीपति ने देवी परिणय काल में इन दोनों को समर्पित करते हुए प्रकृति के साथ अपना अनादित्व प्रकट करते हुए कहा था कि यह प्रकृति हमारे हाथ में अनुविद्ध है तथा प्रकृति तत्त्व से मैं अनुविद्ध हूँ क्योंकि मैं इस श्री की मूर्त्ति का आश्रय हूँ और एतदात्मिका मूर्त्ति मैं हूँ जिस मूर्त्ति का आश्रय ले कर लक्ष्मीनारायण में ध्यान परायण भक्त थोड़े ही काल में इस दुस्तर गुणोदधि को सुख से पार कर लेते हैं, ऐसे श्रीपति का ध्यान करना चाहिए ॥ ८१-८४ ॥ १७. कान्तात्मध्यानकथनम् मदविह्वलनेत्रं च देवमुद्भिन्नयौवनम् । फुल्लरक्ताम्बुजाभासमत्यजन्तं निजां स्मृतिम् ॥ ८५ ॥ त्रैलोक्यविस्मयकरं कान्ताकृतिधरं स्मरेत् । आनन्दामृतसम्पूर्णवदनेनेन्दुकान्तिना ॥ ८६ ॥ कलशाकृतिरूपेण करस्थेन विराजितम् । लीलाकटाक्षवाग्बाणैः सूदयन्तं सुरद्विषः ॥ ८७ ॥ द्विरेफपटलाक्रान्तसहकारलताकरम् । कान्तात्मध्यानमाह—मदविह्वलनेत्रैरिति सार्धैस्त्रिभिः । अस्यावतारस्य लक्ष्मी- नारायणोभयात्मकमुक्तं जगज्जनन्या— यत्तु तन्मोहनं रूपं श्रूयतेऽमृतधारकम् ॥

२७४ सात्वतसंहिता भवद्भावौ तदा तत्र रूपे तुल्योपलक्षितौ । देवैः पुरुषरूपेण स्त्रीरूपेण सुरेतरैः ॥ सह सिद्धं मयीत्येतज्जन्म मे महदद्भुतम् ॥ (८।४८-५०) इति ॥ ८५-८८ ॥ अब कान्तात्मा का ध्यान कहते हैं—जिनके नेत्र मद से विह्वल है, जिनमें यौवन प्रगट हो रहा है, जिनकी कान्ति विकसित कमल के समान हैं, जिन्होंने स्त्री रूप धारण करके भी अपनी स्मृति का त्याग नहीं किया है । ऐसे त्रैलोक्य विस्मयकारी स्त्री रूप धारण करने वाले कान्तात्मा का ध्यान करना चाहिये । जो चन्द्रमण्डल के समान आनन्दामृत से पूर्ण मुख वाले और हाथ में कलश लिये हुए अपने लीला कटाक्षरूपी बाणों से असुरों का वध कर रहे हैं तथा द्विरेफ (भ्रमर से) लिपटी हुई सहकार युक्त लता जिनके हाथ में है ऐसे कान्तात्मा का ध्यान करे ॥ ८५-८८ ॥ १८. राहुजित् ध्यानकथनम् कलामूर्त्त्यभिमानात्मा राहुसंज्ञो विभीषणः ॥ ८८ ॥ मूर्त्तामूर्तेन रूपेण संग्रसत्यनिशं किल । अग्नीषोममयीं मूर्तिं कर्मिणामुपकारिणीम् ॥ ८९ ॥ योऽन्तः प्राणादिरूपेण चन्द्रादित्यात्मना बहिः । स्थितस्तद्विजयेऽध्यक्षः सत्यध्यानरतात्मनाम् ॥ ९० ॥ निष्पन्दं बोधभावेन तं तु व्यक्तं स्मरेद् बहिः । नीलनीरदवर्णाभं पद्मपत्रनिभेक्षणम् ॥ ९१ ॥ मध्याह्नभास्कराकारं द्वादशारकरोद्यतम् । श्रोणीतटनिविष्टेन वामहस्तेन लीलया ॥ ९२ ॥ ध्रियमाणं गदां गुर्वी निषण्णां धरणीतले । राहुजिद्ध्यानमाह—कलामूर्तीत्यादिभिः । अस्यापि क्षीरोदकक्षितिक्षेत्रवासित्व- मेव बोद्धव्यम्, "सिद्धानां च मुनीनां च देवानां मृत्युजित् स्थितः" (३६।३४६) इति पौष्करोक्तेः ॥ ८८-९३ ॥ अब राहुजित् का ध्यान कहते हैं—जो कलामूर्त्ति के अभिमानी देवता है, सबको भयभीत करने वाले हैं, जिनका नाम राहुजित् है, जो मूर्त्त अमूर्त्त दोनों रूपों से संसारी जनों का उपकार करने वाली अग्निमयी एवं सोममयी मूर्त्ति को नित्य ग्रसता रहता है, जो भीतर प्राणादि रूप से तथा बाहर चन्द्रादित्य रूप से स्थित हैं और सत्य ध्यान में निरत रहने वालों के विजय में अध्यक्ष रूप से स्थित है, जो बोध भाव से निष्पन्द (स्थिर) है, जो नीले बादल के समान कृष्णवर्ण की आभा

द्वादशः परिच्छेदः २७५ वाले हैं, जिनके नेत्र कमल के समान विशाल हैं और मध्याह्न भास्कर के समान जो तेजस्वी हैं, जो द्वादश अरों के समान करों से समुद्यत हैं, जो नितम्ब प्रदेश पर स्थित अपने बायें हाथ से पृथ्वी पर रखी हुई गदा को धारण किये हुए हैं, ऐसे राहुजित् भगवान् का ध्यान करना चाहिये ॥ ८८-९३ ॥ १९. कालनेमिघ्नध्यानकथनम् अविद्याख्या च या नेमिः कालचक्रस्य दुर्धरा॥ ९३ ॥ सामाधीयं समाश्रित्य विग्रहं विधुनोति च। जपयज्ञक्रियादीनां तामसेन बलेन च॥ ९४ ॥ ध्यायेत् तत्प्रसरघ्नं च देवं राजोत्पलद्युतिम् । विज्ञानरश्मिभिर्दीप्तं सत्सत्त्वगरुडासनम् ॥ ९५ ॥ नानाश्ररूपभूतात्मसद्विद्याभुजभूषितम् । चक्रं पद्मं गदां बाणमङ्कुशं कुन्तमेव च॥ ९६ ॥ षट्सु दक्षिणहस्तेषु शक्तिं पाशौ च कार्मुकम् । मुसलं मुद्गरं भीमं खेटकं वामबाहुषु ॥ ९७ ॥ कालनेमिघ्नध्यानमाह—अविद्याख्येत्यादिभिः ॥ ९३-९७ ॥ अब कालनेमिघ्न का ध्यान कहते हैं—कालचक्र की दुर्धरा अविद्या नामक नेमि है, जो समिधा का आश्रय लेकर अपने तामस बल से विग्रह को नष्ट करती है। ऐसे जप, यज्ञ, क्रिया के प्रसार को नष्ट करने वाले, कमल के समान प्रकाशक का ध्यान करना चाहिये । जो विज्ञान रश्मियों से उद्दीप्त हैं, सत्सत्त्व गरुडासन पर विराजमान हैं, जो अनेक अस्त्रों से भूतात्मा हैं, सद्विद्या रूप भुजाओं से भूषित हैं, जिनके छः दाहिने हाथों में चक्र, पद्म, गदा, बाण, अङ्कुश और कुन्द तथा ६ बायें हाथों में शक्ति, पाश, कार्मुक, मुसल, मुद्गर, भीम और खेटक है ॥ ९३-९७ ॥ २०. पारिजातहरध्यानकथनम् देव आम्रदलाभश्च स्मर्तव्यः पारिजातजित् । अक्लिष्टकर्मा देवेशस्त्वनेकाद्भुतविक्रमः ॥ ९८ ॥ प्रबन्धप्रतिपन्नानां भक्तानामपि देहिनाम् । यो बोधभूमौ संरूढो ह्यनित्यश्चानुरञ्जकः ॥ ९९ ॥ न्यग्रोधविटपाकारोऽप्यविद्याबन्धलक्षणः । कर्मवृक्षः सुविततो मोहमायाफलावृतः ॥ १०० ॥ तदुत्पाटनसिद्ध्यर्थमनुग्राह्यजनं सदा।

२७६ सात्वतसंहिता आविश्याऽऽस्तेऽशमात्रेण कृपया स जगत्प्रभुः ॥ १०१ ॥ स विवेकात्मना भूत्वा ज्ञानबाहुवितानधृक् । ऐश्वर्यधर्मवैराग्यशमास्यश्चितिशक्तिभृत् ॥ १०२ ॥ आदाय संयमास्त्रौघं नियमास्त्रगुणं तथा । इन्द्रियादिगणं जित्वा कर्मिणां दोषदो हि यः ॥ १०३ ॥ यदस्य सुरजिद्रूपं तद् द्वादशभुजं स्मरेत् । दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्याभरणभूषितम् ॥ १०४ ॥ चतुर्वक्त्रं सुनयनं वामोत्सङ्गार्पितप्रियम् । खड्गं चक्रं गदां बाणं मुसलं च तरूत्तमम् ॥ १०५ ॥ षट्सु दक्षिणहस्तेषु शङ्खमङ्कुशकार्मुके । छत्रं च फणभृत्पाशं विभोर्वामभुजेष्वमी ॥ १०६ ॥ षष्ठेनालिङ्गिता देवी सारविन्देन बाहुना । तदं(श?स)लग्नकरया देव्या तच्चित्तयाऽनिशम् ॥ १०७ ॥ संवीज्यमानं विनयाच्चामरेण सितेन तु । पारिजातहरध्यानमाह—देव आम्रफलाभ इत्यादिभिः । दोषदो दोषच्छेदक इत्यर्थः । “दो अवखण्डने” (१।९४८दि०) इति धातोः । अस्य स्थानं तु पौष्करे— आसाद्य सूकरक्षेत्रं देवो गरुडवाहनः । संस्थितो गरुडारूढः पारिजातकराङ्कितः ॥ सिद्धैः सुरगणैः सार्धं गगने चापि पौष्कर ॥—(३६।३५३-३५४) इति ॥ ९८-१०८ ॥ अब पारिजातहर विष्णु का ध्यान कहते हैं—पारिजात हरण करने वाले, आम्रफल के समान आभा वाले, अक्लिष्ट कर्मा, अनेक अद्भुत कर्म करने वाले देवों के स्वामी का स्मरण करना चाहिये । जो बन्धन में बँधे हुए देहधारी भक्तों के हृदय में उत्पन्न हुए हैं, अनित्य हैं, अनुरञ्जक हैं, न्यग्रोध (= गूलर) के वृक्ष के समान विशाल हैं, जो अविद्या से बाँधने वाले हैं, जो मोहमाया से समाहत करने वाले हैं तथा जो अत्यन्त विस्तृत हैं, उस कर्मवृक्ष को उखाड़कर फेंकने के लिये जो प्रभु हैं और अनुग्राह्यजनों के भीतर कृपापूर्वक प्रविष्ट होकर विवेक स्वरूप से जो स्थित हैं, ज्ञान-बाहुरूप वितान धारण कर ऐश्वर्य, धर्म, वैराग्य, शान्त मुख वाले चिति शक्ति धारण करते हैं, संयमास्त्र समूह तथा नियमास्त्र समूह हाथ में लेकर इन्द्रिय गणों को जीत कर, समस्त दोषों को नष्ट कर देते हैं । जो इनका द्वादश भुजा वाला सुरजित् रूप है, उसका स्मरण करना चाहिये । उनके चार नेत्र हैं, अपने बायें उत्संग में प्रियतमा को बिठाये हुए हैं, अपने छः दक्षिण

द्वादशः परिच्छेदः २७७ हाथों में खेट, चक्र, गदा, बाण, मुसल और पारिजात तथा बायीं भुजा में शङ्ख, अङ्कुश, कार्मुक, इत्र, नागपाश तथा छठी अपनी बलवान् भुजाओं से प्रियतमा का आलिङ्गन किये हुए हैं, जो उनके कन्धे पर हाथ रखकर सर्वदा अपने चित्त में उनका ध्यान करती रहती हैं और श्वेत से चामर लेकर विनयपूर्वक हवा करती रहती हैं ॥ ९८-१०८ ॥ २१. लोकनाथध्यानकथनम् लोकनाथं विशालाक्षं सर्वदेवनमस्कृतम् ॥ १०८ ॥ वरसिंहासनारूढं ध्यायेन्मीलितलोचनम् । पद्मासनेनोपविष्टं पद्मगर्भोपमद्युतिम् ॥ १०९ ॥ करुणाविष्टबुद्धिं च शङ्खपद्मकराङ्कितम् । ज्ञानवैराग्यसद्धर्ममार्गत्रयनिदर्शकम् ॥ ११० ॥ लोकनाथध्यानमाह—लोकनाथमिति सार्धद्वाभ्याम् । अस्य रूपान्तरं बुद्धावतार इति बोध्यम्, लोकेश्वरः शान्ततनुर्बौद्धं यस्यापरं वपुः । नियन्ता बुद्धिधर्माणां हिंसादोषस्य दूषकः ॥—(३६।२२६) इति पौष्करोक्तेः । अस्य स्थानं तु— मगधामण्डले विप्र महाबोधधराश्रितः । संस्थितो लोकनाथात्मा देवदेवो जनार्दनः ॥—(३६।३५९-३६०) इति पौष्करे ॥ १०८-११० ॥ अब लोकनाथ का ध्यान कहते हैं—विशाल नेत्रों वाले, समस्त देवताओं से नमस्कृत, श्रेष्ठ सिंहासन पर बैठे हुए, कमल के समान प्रकाश वाले, करुणा से आविष्ट बुद्धि वाले, हाथ में शङ्ख और पद्म धारण किये हुए, ज्ञान, वैराग्य और सद्धर्म रूप तीनों मार्गों का प्रदर्शन करने वाले भगवान् लोकनाथ का ध्यान करना चाहिये ॥ १०८-११० ॥ २२. दत्तात्रेयध्यानकथनम् संस्मरेदथ दत्ताख्यं ज्ञानमूर्तिमलेपकम् । मनुष्यमुनिदेवानां समाधिनिरतात्मनाम् ॥ १११ ॥ ईषल्लब्धरसानां च ब्रह्ममार्गानुसारिणाम् । स्वप्रभानिकरेणैव भासयन्तं च तत्पथम् ॥ ११२ ॥ मनसा सह वायूनामाकृतिप्रतिषेधकृत् । श्रुतीनां मानसानां चाप्याचाराणां तथैव च ॥ ११३ ॥

२७८ सात्वतसंहिता वर्णानामाश्रमाणां च परिरक्षक एव हि । मानसैकार्णवान्तस्थे निष्कम्पे बुद्धिपादपे ॥ ११४ ॥ अभिमानलताढ्ये चाप्युपरिस्थमनुस्मरेत् । प्रावृङ्गिरिरिव श्यामं तेजसा ज्वलनोपमम् ॥ ११५ ॥ ध्वंसकृद् विघ्नजालस्य निन्द्रालस्यचयस्य यः । उत्कृष्टद्विजरूपेण विकसत्यङ्गरूपिणा ॥ ११६ ॥ स एव द्विभुजो ध्येयो दण्डदर्भक्षसूत्रधृक् । अथ दत्तात्रेयध्यानमाह—संस्मरेदथ दत्ताख्यमित्यादिभिः । संस्मरेदित्यस्य पूर्वे- णैवान्वयः ॥ १११ - ११७ ॥ अब दत्तात्रेय का ध्यान कहते हैं—ज्ञान मूर्ति, संसार से सर्वथा अलिप्त, देवता के मार्ग समाधि में निरन्तर मनुष्य, मुनि मार्ग तथा ब्रह्म मार्ग का अनुसरण करने वाले, ब्रह्म रस को किञ्चिन्मात्रा में प्राप्त करने वाले, मार्ग को अपने प्रभा किरणों से भासित करने वाले, मन के साथ वायु की भी आकृति को रोक देने वाले, श्रुतियों के मानसिक आचारों के वर्णाश्रम धर्मों के एक मात्र परिरक्षक, अभिमान लता से परिपूर्ण, मानस समुद्र के अन्त में स्थित, बुद्धि पादप से परे और उससे भी ऊपर के स्थान में निवास करने वाले भगवान् दत्तात्रेय का स्मरण करना चाहिये । वर्षाकालीन मेघ की तरह श्याम वर्ण वाले, तेज से अग्नि के समान दहकते हुए, विघ्न समूह का विनाश करने वाले, निद्रा एवं आलस्य समूहों के विनाश कर्त्ता, विकसित कमल के समान प्रकाशित रूप से उत्कृष्ट, द्विज रूप से विराजमान उन द्विभुज दत्तात्रेय का ध्यान करना चाहिये जो दण्ड, कुशा और अक्षसूत्र धारण किये हुए हैं ॥ १११-११७ ॥ २३. न्यग्रोधशायीध्यानकथनम् दन्तज्योत्स्नाजिताज्ञानं न्यग्रोधशयनं विभुम् ॥ ११७ ॥ निषण्णमीषदुत्तानं द्विभुजं शिशुरूपिणम् । एवमेव निरस्तास्त्रं शान्तनिद्रारसं स्थितम् ॥ ११८ ॥ अनुज्झितस्वभावं च योगमायाबलेन च । त्यजन्तमाहरन्तं च श्वासोच्छ्वासद्वयेन तु ॥ ११९ ॥ आब्रह्मभुवनं सर्वं कर्म प्राधानिकं हि यत् । न्यग्रोधशयनध्यानमाह—दन्तज्योत्स्नेति त्रिभिः । प्राधानिकं प्राकृतमित्यर्थः । पूर्वोक्त एकार्णवशायी नैमित्तिकप्रलयकर्ता, अयं तु प्राकृतिकप्रलयकर्तेति बोध्यम् । नैमित्तिकप्राकृतिकयोर्लक्षणं तु श्रीविष्णुपुराणे— ब्राह्मो नैमित्तिकस्तत्र यच्छेते जगतः पतिः ।

द्वादशः परिच्छेदः २७९ प्रयाति प्रकृतिं चैव ब्रह्माण्डं प्रकृतो लयः ॥ (१।७।४२) इति ॥ ११७-१२०॥ अब न्यग्रोधशायी का ध्यान कहते हैं—जो अपनी दाँतों की प्रभा से समस्त अज्ञान को दूर करने वाले हैं उन न्यग्रोध के नीचे सोने वाले न्यग्रोधशायी विभु का ध्यान करना चाहिये । कुछ उतान हो कर बैठे हुए हैं, दो भुजा धारण किये हुए, शिशु स्वरूप हैं, अस्त्र रहित हैं, शान्त निद्रा रस का स्वाद ले रहे हैं, योगमाया के बल से अपने स्वभाव का परित्याग नहीं कर पा रहे हैं, जो अपनी श्वास-उच्छ्वास के त्याग एवं ग्रहण के द्वारा ब्रह्म से लेकर भुवन पर्यन्त समस्त प्राधानिक कर्म (प्राकृतिक प्रलय) करते रहते हैं ऐसे न्यग्रोधशायी विष्णु का ध्यान करना चाहिए ॥ ११७-१२० ॥ २४. मत्स्यावतारध्यानकथनम् अपौरुषेण रूपेण संवृतावयवात्मना ॥ १२० ॥ स्वमायाजलमध्यस्थम् अध्यक्षमथ संस्मरेत् । ज्ञानादिगुणवृन्देन पक्षभूतेन भूषितम् ॥ १२१ ॥ स्वोत्थं सन्निःसृतं ब्रह्म एकशृङ्गविराजितम् । कल्पावसानसमये वहन्तं चैव चिन्तयेत् ॥ १२२ ॥ नौरूपां विततां क्षोणीं प्रजापतिगणान्विताम् । मुक्ताफलगणेनैव वपुषा निर्मलेन च ॥ १२३ ॥ अनिमीलितनेत्रः स मीनात्मा भगवानथ । अथ मत्स्यावतारध्यानमाह—अपौरुषेणेति चतुर्भिः । नौरूपां = तरणिरूपा- मित्यर्थः । “स्त्रियां नौस्तरणिस्तरिः” (१।१०।१०) इत्यमरः । तदानीं महालक्ष्मी- रेवैवं नौरूपं बिभर्तीति ज्ञेयम् । तथा च लक्ष्मीतन्त्रे— अवतारो हि यो विष्णोर्नाम्ना मीनधरः शुभः । अनुग्रहक्रमात् तत्र साऽहं नौरूपधारिणी ॥—(८।३३-३४) इति। अस्य स्थानं तु पौष्करे—“मत्स्यात्मा भगवानप्सु” (३६।३१८) इति । मीन- वक्त्रस्थानमप्युक्तं तत्रैव—“नौबन्धनगिरावेव मीनवक्त्रः स्थितः प्रभुः” (३६।३२१) इति ॥ १२०-१२४ ॥ अब मत्स्यावतार का ध्यान कहते हैं—जो अपने अपौरुषेय रूप से अपने रूपावयव को समेट लेते हैं और अपने माया रूप से जल के मध्य में रहने वाले जगत् के अध्यक्ष हैं, उनका स्मरण करे । जो ज्ञानादि गुण समूह रूप अपने पक्ष से विभूषित हैं, जो अपने में उत्पन्न और अपने से ही निकले हुए ब्रह्म रूप एक शृङ्ग से विराज रहे हैं । जो कल्पान्त काल में इस समस्त जगत् को उस शृङ्ग में

२८० सात्वतसंहिता बाँधकर वहन कर रहे हैं। ऐसे मत्स्य भगवान् का चिन्तन करे। प्रजापति गणों से समन्वित इस विस्तृत पृथ्वी को जिन्होंने नाव बना कर मोती के समान अपने निर्मल शरीर से वहन किया है, उन मीनावतार का ध्यान करे ॥ १२०-१२४ ॥ २५. वामनध्यानकथनम् यो नित्यं भवभीतानां बुधानां कृपया स्वयम् ॥ १२४ ॥ हृत्स्थो नियतिदण्डेन मार्ताण्डायुतसन्निभः । जित्वाऽज्ञानबलं भीममिन्द्रियारिगणान्वितम् ॥ १२५ ॥ संयच्छत्यचिराद् ब्रह्मनन्दनं सत्सुखाय च । ध्यायेत् तमेव ह्रस्वाङ्गं श्यामं पद्मदलेक्षणम् ॥ १२६ ॥ अन्तर्निविष्टभुवनं जटावल्कलभूषितम् । छत्रं तद्धामहस्तेऽस्य दण्डमन्यत्र वैष्णवम् ॥ १२७ ॥ वामनध्यानमाह—यो नित्यमित्यादिभिः । अज्ञानं जित्वा अविद्यामपोह्येत्यर्थः । ब्रह्म नन्दयतीति ब्रह्मनन्दनं ज्ञानमित्यर्थः । अस्य स्थानं तु श्रीपौष्करे— कन्दमाले विवैलस्ते कुलकुक्षौ हिमाचले ॥ वामनं खर्वमूर्तिं च वैश्वरूप्येण संस्थितम्। —(३६।३२४-३२५) इति ॥ १२४-१२७ ॥ अब वामन का ध्यान कहते हैं—जो नित्य ही संसार सागर से डरने वाले बुद्धिमानों के हृदय में अपनी कृपा से निवास करते हैं। जो नियति (= भाग्य) रूपी दण्ड से दश हजार सूर्य के समान तेजस्वी हैं, जो भयङ्कर इन्द्रियारि गणान्वित हैं तथा अज्ञान रूप बल को जीतकर स्वल्प काल ही में सज्जनों के सुख के लिये उन्हें ज्ञान प्रदान करते हैं। उन ह्रस्वाङ्ग, वामन स्वरूप, श्याम वर्ण, कमल के समान नेत्र वाले अपने भीतर समस्त प्रश्नों को धारण करने वाले, जटावल्कल से विभूषित, बायें हाथ में छत्र और अन्य हाथ में वैष्णव दण्ड धारण किये हुए हैं, ऐसे भगवान् वामन का ध्यान करना चाहिये ॥ १२४-१२७ ॥ २६. त्रिविक्रमध्यानकथनम् आक्रम्य जाग्रदादित्यः सूर्येन्दुहुतभुकप्रभाम् । तिष्ठत्यनन्तो भगवांस्तुर्याख्याञ्चिद्विभूतिधृक् ॥ १२८ ॥ सम्प्रेरयन्ननिच्छातः स्वपदादमृतप्रभाम् । आह्लादजननीं शक्तिं कर्मिणां भावितात्मनाम् ॥ १२९ ॥ त्रैलोक्यपूरकं ध्यायेत् तमेव हरितद्युतिम् । नानामुद्रास्त्रयुक्तेन भुजवृन्देन भूषितम् ॥ १३० ॥

द्वादशः परिच्छेदः २८१ खेटकेनाङ्घ्रिदण्डेन वहन्तमरिसूदनम् । वहन्तं सद्धैजयन्तीं देवानां च जयार्थिनाम् ॥ १३१ ॥ खड्गचक्रगदादण्डबाणाङ्कुशसमुद्गराः । शक्तिः परशुशैलेन्द्रौ दश दक्षभुजेष्वमी ॥ १३२ ॥ शङ्खतोमरशार्ङ्गं च पाशशूलमहीरुहाः । कुलिशं क्षुरिका चैव लाङ्गलं मुसलं महत् ॥ १३३ ॥ वामहस्तेष्वमी ध्येया अन्ये मुद्रान्विता दश । भयविस्मयहृद् वेणीकण्ठग्रहणलक्षणाः ॥ १३४ ॥ ध्येया मुद्रा विभोः पञ्च सव्ये तु करपञ्चके । वराख्यां भूतिसंज्ञां च युक्ताख्यां साभयां तु वै ॥ १३५ ॥ गोपनीं दक्षहस्तेषु तत्संख्येषु च संस्मरेत् । त्रिविक्रमध्यानमाह—आक्रम्येत्यादिभिः । आह्लादजननीं शक्तिं गङ्गामित्यर्थः । तथा च लक्ष्मीतन्त्रे— त्रैविक्रमाह्वयो विष्णोरवतारः परः स्मृतः ॥ आह्लादजननी गङ्गा तत्पादात् प्रभवम्यहम् ।—(८।३४-३५) इति । अस्य स्थानं तु श्रीपौष्करे— मध्यदेशे तु गङ्गायाः कुरुक्षेत्रे तु पौष्कर ॥ यामुनं कूलमासाद्य प्रादुर्भावान्तरं महत् । स्थितं त्रिविक्रमाख्यं यस्त्रैलोक्याक्रान्तविग्रहः ॥—(३६।३२५-३२६) इति ॥ १२८-१३६ ॥ अब त्रिविक्रम का ध्यान कहते हैं—सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि के तेज का आक्रमण कर जो स्वयं जाग्रत् आदित्य हैं जिन अनन्त भगवान् को तूर्य नाम से कहा जाता है । जो चिद्विभूति को धारण किये हुए हैं, जो अपनी अनिच्छा से पुण्यात्मा, संसारी मनुष्यों के कल्याण के लिये शक्ति स्वरूपा आह्लाद की जननी श्री गङ्गा जी को अपने पैर से प्रेरित कर रहे हैं । अपने पैसे समस्त त्रिलोकी को पूर्ण करने वाले कृष्ण वर्ण वाले त्रिविक्रम का ध्यान करना चाहिये जो अनेक प्रकार के मुद्रास्य युक्त भुजाओं से विभूषित है । जिन अरिसूदन को अङ्घ्रिदण्ड रूप खेटक से वहन किया जा रहा है । जो विजय की इच्छा करने वाले देवताओं की वैजयन्ती को वहन कर रहे हैं । जो अपनी बलशाली भुजाओं में खेट, चक्र, गदा, दण्ड, बाण, अङ्कुश, मुद्गर, शक्ति, परशु और शैलेन्द्र (वज्र) इन दश आयुधों को धारण किये हुए हैं । शङ्ख, तोमर, शार्ङ्ग, धनुष, पाश, शूल, महीरुह, कुलिश, क्षुरिका, लाङ्गल और महान मुशल इन दश को अन्य बायें हाथ में धारण किये हुए हैं । सा० सं० - २२

२८२ सात्वतसंहिता इसके अतिरिक्त दश मुद्रायें भी उन्हीं हाथों में रहती हैं, उनका भी ध्यान करना चाहिये। भयङ्कर, विस्मय, हृदययुक्त, वेणी, कण्ठ और ग्रहण लक्षण वाली इन पाँच मुद्राओं का भी ध्यान करे, जो बायें पाँचों हाथों में रहती हैं। वरा नाम वाली, भूति नाम वाली, युक्ता नाम वाली, समया और गोपनी नामक मुद्राएँ उनके दाहिने पाँचों हाथों में रहती हैं। इनका भी ध्यान करे॥ १२८-१३६॥ २७-३०. नर-नारायण-हरि-कृष्णानां ध्यान कथनम् जगत्सूत्रं सहाक्षैस्तु येनोक्तममितात्मनाम्॥ १३६॥ गुणषट्कस्वरूपेण पूर्वोक्ताकृतिभिर्विना। स्मर्त्तव्यः स चतुर्धा वै लाञ्छनास्त्रविवर्जितः॥ १३७॥ सर्वदा परिरक्षन्तु जपपूर्वं चतुष्टयम्। योगक्रियातपोऽन्तं च सद्दिभूत्यपवर्गदम्॥ १३८॥ नराद्यः कृष्णनिष्ठश्च पृथगेकत्र चेच्छया। नरं तत्र प्रवालाभमर्धोन्मीलितलोचनम्॥ १३९॥ अन्तर्निविष्टभावं च शब्दब्रह्मैकमानसम्। पदोपलक्षणं मन्त्रं लपमानमलक्षितम्॥ १४०॥ स्फाटिकेनाक्षसूत्रेण करस्थेन च शोभितम्। गणयन्नक्षसूत्रीयानावर्तान् वामपाणिना॥ १४१॥ अथ नारायणं देवं ध्यायेत् कुमुदपाण्डरम्। बद्धब्रह्माञ्जलिं शान्तं हृत्पद्मार्पितमानसम्॥ १४२॥ युञ्जानं च स्वमात्मानं परस्मिन्नव्यये पदे। कमण्डलुधरं ध्यायेत् काञ्चनाभमतो हरिम्॥ १४३॥ विष्टराविष्टपाणिं च क्रियाकाण्डप्रदर्शकम्। पठन्तमनिशं शास्त्रं पञ्चरात्रपुरस्सरम्॥ १४४॥ कृष्णमिन्दीवरश्याममूर्ध्वबाहुं जटाधरम्। पादेनैकेन तिष्ठन्तमाहरन्तं च मारुतम्॥ १४५॥ एकत्रिषड्द्विषड्रत्राद्यतिकृच्छ्रपरायणम्। पक्षमासोपवासांश्च दिशन्तमनुचिन्तयेत्॥ १४६॥ कृष्णाजिनोत्तरीयाश्च सर्वे काषायधारिणः। ब्रह्मलिङ्गधराः सर्वे सर्वे ब्रह्मपरायणाः॥ १४७॥ मुख्यकर्मपरिक्रान्ताः साधूनां प्रेरणाय च। कालानुकालमाश्रित्य सर्वे सर्वपरायणाः॥ १४८॥

द्वादशः परिच्छेदः २८३ अथ नरादीनां चतुर्णां ध्यानमाह—जगत्सूत्रमित्यादिभिः । जप-योग-क्रिया- तपः-परिरक्षकत्वं नर-नारायण-हरि-कृष्णानां क्रमेण बोध्यम् । एषां स्थानानि तु— नरसंज्ञो जगन्नाथः सिद्धैः सम्पूजितेषु च । भूभागेषु च रम्येषु नित्यं सन्निहितः स्थितः ॥ गिरौ गोवर्धनाख्ये तु देवः सर्वेश्वरो हरिः । संस्थितः पूजिते स्थाने गवां निष्क्रमणेेषु च ॥ सालिग्रामे च भगवान् राजेन्द्राख्ये वने द्विज । तथैव वसुधांशेन स्थितो देवव्रताभिधे ॥ कृष्णोऽपरश्चतुर्मूर्तिरवत्तीर्य धरातले । स्थितः पिण्डारके विप्र मोचयन् दुष्कृताज्जनान् ॥ —(पौ० सं० ३६।३३३-३३६) इति ॥ १३६-१४८ ॥ अब नर, नारायण, हरि और कृष्ण का ध्यान कहते हैं—जिन्होंने पूर्वोक्त आकृति के बिना केवल षाड्गुण्य स्वरूप से ज्ञानियों के लिये अक्षसूत्र के साथ जगत्सूत्र का उपदेश किया । लाञ्छनास्त्र से विवर्जित उन्हें चार प्रकार से ध्यान करना चाहिये । वे अपने चारों रूपों से सद्विभूति और अपवर्ग देने वाले जप, योग, क्रिया और तप की सर्वदा रक्षा करें । नर, नारायण, हरि और कृष्ण चाहे पृथक् हों अथवा एकत्र हों, उनमें इनकी इच्छा ही प्रधान है, उनमें भगवान् नर प्रवाल की आत्मा वाले हैं, उनके नेत्र आधे खुले हैं, समस्त भाव उनके अन्तःकरण में सन्निविष्ट हैं, मानस शब्दब्रह्मैकनिष्ठ है, वे अलक्षित होकर पदोपलक्षण मन्त्र का जप करते रहते हैं और बायें हाथ में स्थित स्फटिक की माला से आवृत्त माला की संख्या की गणना करते रहते हैं । अब कुमुद के समान स्वच्छ वर्ण वाले नारायण का ध्यान कहते हैं जो ब्रह्माञ्जलि बाँधे हुए हैं, शान्त हैं, अपना मन हृदयपद्म में अर्पित किये हुए हैं, अपनी आत्मा को पर अव्यय पद में संयुक्त किये हुए हैं । अब हरि का ध्यान कहते हैं जो कमण्डल धारण किये हुए हैं । जिनके शरीर की आभा काञ्चन के समान है, विष्टर पर हाथ रखे हुए हैं, जो क्रियाकाण्ड के प्रदर्शक हैं और जो पञ्चरात्रपुरःसर सर्वदा शास्त्रों का पाठ करते रहते हैं । अब कृष्ण का ध्यान कहते हैं—नीलकमल के समान श्याम वर्ण वाले, ऊपर की ओर भुजा उठाये, जटा धारण किये हुए, एक पैर से खड़े होकर वायु पान करते हुए, भगवान् कृष्ण का ध्यान करना चाहिए । एक, तीन, छह या बारह रात्रि पर्यन्त अतिकृच्छ्र व्रत करने वाले एक पक्ष एवं मास पर्यन्त उपवास का उपदेश करने वाले ऐसे कृष्ण का ध्यान करना चाहिये । नर, नारायण हरि और

२८४ सात्वतसंहिता कृष्ण ये सभी कृष्णमृग का उत्तरीय तथा काषाय (गेरुआ) वस्त्र धारण किये हुए हैं। सभी ब्राह्मण चिह्नधारी हैं और वेद पाठ में लगे रहने वाले हैं। साधुओं को प्रेरणा देने के लिये अपने मुख्य कर्म में लगे रहते हैं, काल-अनुकाल का आश्रय लेकर सभी सबका हित करते हैं ऐसे चारों विष्णु के अवतारों का ध्यान करना चाहिए ॥ १३६-१४८ ॥ ३१. परशुरामध्यानकथनम् असङ्गशक्त्या भगवान् सत्कुठाराभिधानया । छिनत्ति बद्धमूलान् यः कर्मवृक्षांस्तु कर्मिणाम् ॥ १४९ ॥ तमेव द्विभुजं ध्यायेदुदयादित्यवर्चसम् । कृष्णैणचर्मवसनं सत्कुठारकराङ्कितम् ॥ १५० ॥ परशुरामध्यानमाह—असङ्गशक्त्येति द्वाभ्याम्। अस्य स्थानं तु— नगोत्तमे महेन्द्राख्ये परश्वधकरो द्विजः । रामसंज्ञश्च भगवान् संस्थितः क्षत्रियान्तकः ॥ —(पौ०सं० ३६।३२७) इति ॥ १४९-१५० ॥ अब परशुराम का ध्यान कहते हैं—जो भगवान् बिना किसी की सहायता से अपनी कुल्हाड़ी मात्र से संसारी जीवों के बद्धमूल कर्मवृक्ष का उच्छेदन करते हैं, उदीयमान सूर्य के समान तेजस्वी दो भुजा वाले उन भगवान् परशुराम का ध्यान करना चाहिये। काले मृग के चर्म का वस्त्र तथा हाथ में कुठार धारण किये हुए उन परशुराम का ध्यान करना चाहिये ॥ १४९-१५० ॥ ३२. श्रीरामध्यानकथनम् दशेन्द्रियाननं घोरं यो मनोरजनीचरम् । विवेकशरजालेन शमं नयति योगिनाम् ॥ १५१ ॥ ध्येयः स एव विश्वात्मा सतोयजलदप्रभः । रक्तराजीवनयनो धनुःशरकराङ्कितः ॥ १५२ ॥ श्रीरामध्यानमाह—दशेन्द्रियाननमिति द्वाभ्याम्। अस्य स्थानं तु— धराधरे चित्रकूटके रक्षःक्षयकरो महान् । संस्थितश्चापरो रामः पद्मपत्रायतेक्षणः ॥—(पौ० सं० ३६।३२८) इति ॥ १५१-१५२ ॥ अब राम का ध्यान कहते हैं—जो योगियों के मन रूपी महाघोर रावण राक्षस को अपने विवेक रूप शर जाल से शान्त कर देते हैं। सज्ज्ल बादल के

द्वादशः परिच्छेदः २८५ समान कान्ति वाले, कमल नेत्र, हाथ में धनुष एवं बाण धारण किये हुए उन विश्वात्मा भगवान् राम का ध्यान करना चाहिये ॥ १५१-१५२ ॥ ३३. वेदव्यासध्यानकथनम् वाग्वेदमण्डलं यो वै स्वरूपद्युतिलक्षणम् । स्वयं स्वोत्थं विभजति त्रिधा पश्यन्तिपूर्वकम्॥ १५३ ॥ बोधमारुतहृत्पूर्वस्थानेष्वभ्युदितं क्रमात् । स्मर्तव्यः सोऽपि भगवानतसीकुसुमद्युतिः ॥ १५४ ॥ वहन् वै वामहस्तेन सर्वशास्त्रार्थपुस्तकम् । दक्षिणेन तु शास्त्रार्थमादिशंश्च यथास्थितम् ॥ १५५ ॥ युगानुसारिबोधानामक़्खेदजननाय च । विभजंस्तु चतुर्धा वै वेदमेकं त्रिकालवित् ॥ १५६ ॥ अथ वेदव्यासध्यानमाह—वाग्वेदमण्डलमियादिभिः । स्वरूपद्युतिलक्षणम्, अन्तःस्थितज्योतिःस्वरूपमित्यर्थः, ‘‘स्वरूपज्योतिरवान्तर्भावयन् संस्थितं हृदि’’ (३४।६३) इति पौष्करोक्तेः । केवलशान्तस्वरूपमिति यावत् । वाग्वेदमण्डलं शब्दब्रह्मोत्यर्थः । पश्यन्तीपूर्वकं त्रिधा विभजति पश्यन्ती-मध्यमा-वैखरीभेदैस्त्रेधा विभक्तं करोतीत्यर्थः । एताः शब्दब्रह्मणोऽवस्थाः सुव्यक्तमुक्ता लक्ष्मीतन्त्रे— बोधोन्मेषः स्मृतः शब्दः शब्दोन्मेषोऽर्थ उच्यते । उद्यच्छब्दोदयः शक्तेः प्रथमः शान्ततात्मनः ॥ स नाद इति विख्यातो वाच्यतामसृणस्तदा । नादेन सह शक्तिः सा सूक्ष्मेति परिगीयते ॥ नादात् परो य उन्मेषो द्वितीयः शक्तिसंभवः । (बिन्दुरित्युच्यते सोऽत्र वाच्योऽपि मसृणः स्थितः ॥) पश्यन्ती नाम साऽवस्था मम दिव्या महोदया । ततः परो य उन्मेषस्तृतीयः शक्तिसंभवः ॥ मध्यमा सा दशा तत्र संस्कारयति सङ्गतिम् । वाच्यवाचकभेदस्तु तदा संस्कारतामयः ॥ चतुर्थस्तु य उन्मेषः शक्तेर्माध्यमिकात् परः । वैखरी नाम साऽवस्था वर्णवाक्यस्फुटोदया ॥ अस्ति शक्तिः क्रियात्मा मे बोधरूपाऽनुसारिणी । सा प्राणयति नादादिं शक्त्युन्मेषपरम्पराम् ॥ शान्तरूपाऽथ पश्यन्ती मध्यमा वैखरी तथा । —(१८।२२-२९) इति । बोधमारुतहृत्पूर्वस्थानेष्वभ्युदितं क्रमादिति पश्यन्त्याद्यवस्थात्रयस्य विशेषणं बोध्यम्,

२८६ सात्वतसंहिता वैखरी शब्दनिष्पत्तिर्मध्यमा बुद्धिसंयुता । द्योतितार्था च पश्यन्ती सूक्ष्मा वागनपायिनी ॥ इत्युक्तैः ॥ १५३-१५६ ॥ अब वेदव्यास का ध्यान कहते हैं—जो आत्मस्वरूप को प्रकाशित करने वाले, वेदमण्डल को स्वयं अपने ज्ञान से पश्यन्ती, मध्यमा एवं वैखरी पूर्वक तीन भागों में प्रविभक्त करते हैं, जो ज्ञानरूपी वायु से आहरण किये जाने के स्थान में उत्पन्न होते हैं । ऐसे अलसी पुष्प के समान प्रभा वाले भगवान् वेदव्यास का स्मरण करना चाहिये । जो अपने बायें हाथ से सभी शास्त्रों की पुस्तक तथा दाहिने हाथ से सभी शास्त्रों का उपदेश यथास्थित रूप से करते हैं और जो त्रिकालवेत्ता हैं, जो युगानुसारी बोध को बिना परिश्रम ज्ञान के लिये एक ही वेद को चार भागों में विभक्त कर देते हैं, उन वेदव्यास का ध्यान करना चाहिये ॥ १५३-१५६ ॥ ३४. कल्किध्यानकथनम् दानधर्मरतानां च यागयज्ञानुयाजिनाम् । तपःस्वाध्यायसक्तानां मुक्तानां वै पुनर्भावात् ॥ १५७ ॥ संरक्षणाय योग्यत्वविज्ञानव्यक्तयेऽपि च। समुदेति जगन्नाथस्तेषां हृत्कमलावने ॥ १५८ ॥ मनोवाजिनमाक्रम्य त्वादद्यात्मगुणायुधान् । नूनमुत्पाटयत्याशु जन्मान्तरशतोत्थितम् ॥ १५९ ॥ वैषयं वासनाजालं शुद्धविज्ञानसिद्धये । ध्यायेद् वराश्वगं तं वै तनुत्रावृतविग्रहम् ॥ १६० ॥ सितोष्णीषललाटं च नातिदीर्घजटाधरम् । द्रवत्कनकवर्णाभम् इषुधिद्वयमध्यगम् ॥ १६१ ॥ शरचापकरव्यग्रं खड्गकुन्तकुठारिणम् । यज्ञाध्ययनदानानि परिरक्षन्तमेव हि ॥ १६२ ॥ शातयन्तमवर्णांश्चाप्यधर्मनिरतात्मनः । अथ कल्किध्यानमाह—दानधर्मरतानां चेत्यादिभिः । अस्य स्थानं तु श्री- पौष्करे— कल्की विष्णुश्च भगवान् स्तूयमानो द्विजैः स्थितः । समासाद्य विपाशां च नदीं नियतमानसः ॥ (३६।३३१) इति ॥ १५७-१६३ ॥ अब कल्कि का ध्यान कहते हैं—दान, धर्म में निरत, योग-यज्ञ करने वाले तपःस्वाध्याय में लगे हुए, मुक्त जनों को संसार से संरक्षण के लिये,

द्वादशः परिच्छेदः २८७ सर्वोत्तम विज्ञान प्रगट करने के लिये, जो जगन्नाथ हृदयरूपी कमलावन में उत्पन्न होते हैं, जो मन रूपी घोड़े पर चढ़कर, अपने गुणरूपी आयुध को लेकर, सैकड़ों जन्म से उत्पन्न वैषयिक वासना जाल को शुद्ध विज्ञान वृद्धि के लिये शीघ्र उखाड़ कर फेंकते हैं, ऐसे शीघ्रगामी घोड़े पर सवार होकर शरीर में कवच धारण किये हुए, सिर पर स्वच्छ उष्णीष (साफा) बाँधे हुए, सामान्य जटा धारण किये हुए, तप्त काञ्चन के समान उद्दीप्त, दो तरकसों में बाण तथा हाथ में धनुष धारण किये हुए, तलवार, भाला और कुठार धारण कर संसारी लोगों के यज्ञ, अध्ययन एवं दान की रक्षा करते हुए, अधर्म निरत पापियों को विनष्ट करने वाले भगवान् कल्कि का ध्यान करना चाहिये ॥ १५७-१६३ ॥ ३५. पातालशयनध्यानकथनम् सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । आधारं भुवनानां च ध्यातव्यस्तदधः स्थितः ॥ १६४ ॥ अनन्तशयनारूढः कल्पान्तहुतभुक्प्रभः । ज्वलज्ज्वालावलीयुक्तो ज्वलनांशुकवेष्टितः ॥ १६५ ॥ चक्राद्यायुधवृन्देन मूर्तेन परिवारितः । स्थिताङ्घ्रिदेशतो लक्ष्मीश्चिन्ता दक्षिणतो विभोः ॥ १६६ ॥ मूर्धदेशगता निद्रा पुष्टिस्तद्वामतः स्थिता । पातालशयनध्यानमाह—सर्वतत्त्वाश्रयमित्यादिभिः । पद्मनाभपातालशय्येकार्ण- वशायिन्यग्रोधशायिनां स्थानानि श्रीपौष्करे प्रतिपादितानि— क्षीरोदधौ पद्मनाभः शेषाहिशयनो हरिः । स्थितो नाभ्यब्जसंभूतो यस्माच्चैव पितामहः ॥ चतुर्धा रूपमाश्रित्य विश्वेऽस्मिन् सैव वर्तते । हिताय सर्वलोकानां यथा तदवधारय ॥ आसाद्य शयनं ब्रह्मन् पातालतलसंस्थितः । वटमादाय चाग्नेयं योऽन्ते संहरते जगत् ॥ वटमूलं समाश्रित्य प्रयागे सुरपूजिते । जगदेकार्णवं कृत्वा दिव्यमासाद्य पादपम् ॥ संतिष्ठते स भगवान् तस्मिंस्तीरे क्षितौ द्विज । न्यग्रोधशयनं चैव ध्यायेद् दिव्यगतिप्रदम् । (३६।३३८-३४२) अस्यैवं शक्तिचतुष्टयान्वितत्वं लक्ष्मीतन्त्रेऽप्युक्तम्— अनन्तशयनो नाम योऽवतारो हरेरहम् ॥ स्थिता चतुर्दिशं तस्य चातुरात्म्यमुपेयुषी । लक्ष्मीश्चिन्ता तथा निद्रा पुष्टिश्चेताख्यया युता ॥ (८।३५-३६) इति ॥ १६३-१६७ ॥

अब पातालशयन का ध्यान कहते हैं—सभी तत्त्वों के आश्रय तत्त्व, सर्व- शक्तिमय, विभु (= व्याप्त), सभी इन्द्रियों को भासित करने वाले, किन्तु स्वयं सर्वान्द्रिय विवर्जित, सभी भुवनों के आधार, पाताल में स्थित, अनन्तशायी और कल्पान्त अग्नि स्वरूप पातालशायी भगवान् का ध्यान करना चाहिये । जो जाज्वल्यमान ज्वाला से युक्त ज्वलन का वस्त्र धारण किये हुए हैं । जो मूर्त्तिमान् चक्रादि आयुध समूह रूप परिवारों से घिरे हुए हैं । जिनके पाद-प्रदेश में लक्ष्मी तथा जिन प्रभु के दाहिने चिन्ता स्थित हैं, शिर के पास निद्रा एवं बायीं ओर पुष्टि स्थित हैं इस प्रकार के पातालशायी प्रभु का ध्यान करना चाहिए ॥ १६३-१६७॥

प्रधानदेवताध्यानमिदमुक्तं समासतः ॥ १६७ ॥ यज्ज्ञात्वा विनिवर्त्तन्ते जन्ममृत्युजरारुजः । नास्त्रैर्वस्त्रैर्ध्वजैर्येषां व्यक्तिर्व्यक्ता जगत्त्रये ॥ १६८ ॥ तेऽपि लाञ्छनवृन्दं तु धारयन्त्यङ्घ्रिगोचरे । ललाटे चांसपट्टे तु पृष्ठे पाणितलद्वये ॥ १६९ ॥ तनूरुहचये मूर्ध्नि कर्मिणां प्रतिपत्तये ।

फलकथनेन सहोक्तमर्थं निगमयति—प्रधानेति । एषां विभवदेवानामुक्तक्रमेण हस्तादिषु तत्तन्मूर्त्तिज्ञापकायुधादिलाञ्छनराहित्ये- ऽपि तेषामङ्घ्रिललाटादिषु लाञ्छनमस्ति, तत्सावधानं परीक्षित्वव्यमित्याह—नास्त्रैरिति द्वाभ्याम् । इदं श्लोकद्वयमीश्वर (३।१८४-१८३) पारमेश्वर(१०।९३-९५)योरपि विमानार्चनप्रकरणे प्रतिपादितम् । किन्तु तयोः केषुचित् कोशेषु—''अस्त्रैर्वस्त्रै- र्ध्वजैर्येषाम्'' इति नकारो न दृश्यते । तल्लेखकप्रमादकृतम्, मूलविरुद्धत्वात् । यद्वा ईश्वरव्याख्याने तत्पाठस्यापि गतिर्दर्शिताैव । पारमेश्वरव्याख्याने—''अङ्घ्रिगोचरे स्थित्यासनादिना, ललाटे नेत्रत्रयादिना, अंसपट्टे भुजभेदेन, पृष्ठे शरचक्रादिना'' इत्यादिक्रमेण व्याख्यातम् । तदसंगतम्, लाञ्छनशब्दस्य चक्रादिपरत्वेनैव सार्वत्रिक- प्रसिद्धेः । उत्तरश्लोक एव ''न जहात्यच्युतं लिङ्गम्'' (१२।१७१) इति कण्ठरवेणात्र वक्ष्यमाणत्वाच्च ॥ १६७-१७०॥

यहाँ तक हमने संक्षेप में प्रधान देवता का ध्यान कहा । (अध्याय नव में पाताल शयन प्रभु ही तक मुख्य अवतार कहा गया है जैसा कि वेदवित् भगवान् कल्की पाताल शयनः प्रभुः १९.९३) कहा । अब विभव देवताओं का वर्णन करते हैं—जिनके ज्ञान से जन्म, मृत्यु, जरा और रोग निवृत्त हो जाते हैं, जिनकी अभिव्यक्ति (प्राकट्य) अस्त्र, वस्त्र और ध्वज से तीनों लोक में नहीं जानी जाती किन्तु वे भी अपने पैरों में, ललाट में, अंसपट्ट में, पृष्ठ में, दोनों हाथों में, बालों में एवं शिर में कर्म करने वाले जीवों के ज्ञान के लिये तथा संसारी मनुष्यों के लिये अथवा वैष्णव स्वभाव से लाञ्छन वृन्द धारण करते हैं ॥ १६७-१७० ॥

द्वादशः परिच्छेदः २८९ अपि संसारिणो जन्तोः स्वभावाद् वैष्णवस्य च ॥ १७० ॥ न जहात्यच्युतं लिङ्गं किं पुनर्विभवाकृतेः । सर्वेषां कामचारित्वं यदुक्तं वै मया पुरा ॥ १७१ ॥ तदङ्घ्रिभुजवर्णास्यबृहन्मध्याणुलक्षणम् । एकाद्यनेकसंख्यं च दृश्यं सर्वत्र सर्वदा ॥ १७२ ॥ उक्तमर्थं किंपुनर्न्यायेन द्रढयति—अपीति । जन्तोरिति, विभवाकृतेरिति च कर्मणि षष्ठी । केवलवैष्णवजनस्यैव सामुद्रिकलक्षणपरीक्षणकाले हस्ताद्यवयवेषु चक्रादिलाञ्छनं दृश्यते । साक्षाद्विष्णोर्विभवावतारस्य तथा लाञ्छ(नस्त्वेकः?ने कुतः) संदेह इति भावः । उक्तानां विभवदेवानां सर्वेषामपि "कृष्णरूपाण्यसंख्यानि" इतिवद् भुजवर्णाद्युधादिभिरसंख्यातकामरूपधरत्वमाह—सर्वेषामिति सार्धेन ॥ १७०-१७२॥ जब वे अपना अच्युत लिङ्ग (= चिह्न) भी नहीं त्यागते हैं, फिर विभवा- कृति चिह्न के विषय में क्या कहा जाय? ऊपर कहे गये सभी विभव देवों के जब असंख्य कृष्ण रूप हैं तब उनकी भुजायें, वर्ण और आयुध भी असंख्य हो सकते हैं ॥ १७०-१७२ ॥ न त्वन्यरूपता कार्या करणं कामरूपता । यस्मादस्ति पृथग्भूतो व्यापारो विश्वमन्दिरे ॥ १७३ ॥ देवानां स्थितिसंहारसृष्टिकाले स्वकः स्वकः । सत्येवं नियमे सिद्धे तथापि भगवद्वशात् ॥ १७४ ॥ चातुरात्म्यसमूहात् तु यत्पद्मदलभूस्थितम् । तथा विभवदेवानां मध्यात् पद्मदलेक्षण ॥ १७५ ॥ एकस्त्वनुग्रहार्थं तु शक्त्यात्मा भावितात्मनाम् । बिभर्ति बहुभेदोत्थं रूपं सद्वाहनस्थितम् ॥ १७६ ॥ एवं सर्वेषां कामरूपवत्तापि नहि मूर्त्तिविपरीतज्ञानजननी, तत्तन्मूर्त्तिनिर्णायक- विजातीयस्वस्वव्यापारसत्त्वादित्याह—न त्विति सार्धेन । यद्यप्येवं सर्वेषां कामरूप- धरत्वनियमः सिद्धः, तथापि सर्वे देवा युगपत् कामरूपधरा न भवन्ति, जाग्रद्व्यूह- वासुदेवादीनां मध्ये पद्मनाभादिविभवदेवानां मध्ये वा एको जगद्रक्षणार्थं वक्त्रभुजास्त्र- शक्तिवाहनभेदैर्बहुधा रूपं बिभ्रन् शक्त्यात्मसंज्ञां भजतीत्याह—सत्येवमिति सार्ध- द्वाभ्याम् । यत्पद्मदलभूस्थितं जाग्रद्व्यूहसं(ज्ञां?ज्ञं) चातुरात्म्यमित्यर्थः, तत्पत्रमध्ये भगवान् जाग्रत्संज्ञे पदे त्वथ । यष्टव्यो भावनीयश्च यथा तदधुनोच्यते ॥ (५।४) इति जाग्रद्व्यूहस्य हि पद्मदलभूस्थितत्वमुक्तम् ॥ १७३-१७६ ॥ इस प्रकार सबकी कामरूपता भी मूर्त्तिविपरीत ज्ञान की जननी नहीं हैं

२९० सातवतसंहिता क्योंकि उसमें तत्तन्मूर्त्ति निर्णायक द्विजातीय एवं स्व-स्व व्यापार स्थित हैं, क्योंकि इस विश्वमन्दिर में उन देवताओं के सृष्टि, स्थिति एवं संहार काल में अपने-अपने कामरूप परतत्त्व के नियम हैं तथापि भगवद्वश से एवं चातुरात्म्य समूह से जो पद्मदल की भूमि में स्थित हैं वे जाग्रद् व्यूह वासुदेव के मध्य में, अथवा पद्मनाभादि विभव देवों के मध्य में कोई एक भी इस जगत् की रक्षा के लिये वक्त्र, भुजा, अस्त्र, शक्ति एवं वाहन भेदों से अनेक रूप धारण करते हुए शक्ति संज्ञा प्राप्त कर लेते हैं ॥ १७०-१७६ ॥ वाहनस्य भेदान्, तल्लक्षणकथनम् यदनुस्मरणाद् ध्यानादर्चनादचिरात् पुमान् । प्राप्नोति मनसोऽभीष्टं तन्मे निगदतः शृणु ॥ १७७ ॥ सत्यः सुपर्णो गरुडस्तार्थ्यश्च विहगेश्वरः । पञ्चात्मकस्य प्राणस्य विकारस्त्वेष पञ्चधा ॥ १७८ ॥ आचाङ्घ्रिगोचरात् सर्वो यस्य देहस्तु पौरुषः । द्विभुजस्तुहिनाभश्च स सत्यः प्राणदैवतम् ॥ १७९ ॥ सुपर्णः पद्मरागाभो निर्मलः स्वर्णलोचनः । गरुडः काञ्चनाभस्तु कुटिलभ्रवरुणेक्षणः ॥ १८० ॥ केकराक्षस्तु तार्थ्यो वै प्रावृड्जलदसन्निभः । द्रवत्कनकनेत्रस्तु शबलाभश्च पञ्चमः ॥ १८१ ॥ चतुर्भुजाः सुपर्णाद्याः सौम्यरूपास्त्वनाकुलाः । पतत्त्रिचरणाः सर्वे पक्षमण्डलमण्डिताः ॥ १८२ ॥ लम्बोदराः सुपीनाङ्गाः कुण्डलाद्यैस्तु भूषिताः । कुटिलभूसुवृत्ताक्षा वक्रतुण्डाः स्मिताननाः ॥ १८३ ॥ अपानादिसमीराणामाधिपत्येन संस्थिताः । महाबला महाकाया रक्ततुण्डोऽत्र पञ्चमः ॥ १८४ ॥ आधेयचरणाधःस्थः सव्य आद्यस्य वै करः । दक्षिणश्चाक्षसूत्रेण सुसितेन च भासितः ॥ १८५ ॥ एवमेव सुपर्णस्य परिज्ञेयं भुजद्वयम् । नाभ्युद्देशेऽपरो वाम उत्तानस्तु सविस्मयः ॥ १८६ ॥ पुष्पस्तबकसम्पूर्ण ऊर्ध्ववक्त्रस्तु दक्षिणः । गरुडस्य द्वयं विद्धि हृद्देशेऽञ्जजलीरूपिणम् ॥ १८७ ॥ तत्रैव सम्पुटाकारं चतुर्थस्य करद्वयम् ।

द्वादशः परिच्छेदः २९१ दक्षिणेऽमृतकुम्भस्तु वामे तु विषमः फणी ॥ १८८ ॥ पञ्चमस्य द्वयं शेषं त्रयाणां च द्वयोः समम् । आधेयचरणाक्रान्तो यदि वै दक्षिणः करः ॥ १८९ ॥ सञ्चारो विहितो वामे त्वक्षसूत्रस्य वै तदा । आधेयचरणाधःस्थं यस्य पाणितलद्वयम् ॥ १९० ॥ निरस्तसूत्रं तं विद्धि वाहनं भगवन्मयम् । अथ प्रसक्तस्य वाहनस्य भेदान् तल्लक्षणं चाह—यदनुस्मरणादित्यादिभिर्भागव- न्मयमित्यन्तैः । आ चा‌ङ्घ्रिगोचरात् चरणादारभ्य यस्य सर्वो देहः पौरुषः समस्तोऽपि कायः पुरुषाकृतिरित्यर्थः । प्राणदैवतं प्राणाधिपतिरित्यर्थः । केकराक्षः केकरे वक्रे अक्षिणी यस्य स तथोक्तः । "बलिरः केकरे" (२।६।४९) इत्यमरः । केकरपदेनैव वक्राक्षत्वे सिद्धेऽप्यत्र पृथगक्षपदनिर्देशात् केकरशब्दस्य वक्रमात्रपरत्वं बोध्यम् । पारमेश्वरव्याख्याने तु—"केकराक्षो भगवद्ध्यानवशादर्धोन्मीलितलोचनः" इति लिखितम्, तद्विचारणीयम् । शबलाभः = चित्रवर्णाभ इत्यर्थः । आद्यस्य सत्यस्य सव्यः करो वामहस्तः । आधेयचरणाधस्थः आधेयस्य निजस्कन्धाधिरूढस्य भगवतः पादपद्माधः स्थित इत्यर्थः । दक्षिणस्तु अक्षसूत्रेण भासितः । अत्र चकारद्वयेन कदाचिद्वामहस्तस्याप्यक्षसूत्रभासितत्वम्, दक्षिणस्याप्याधेयचरणा(धः)स्थितत्वं च संभवतीत्यर्थः सूच्यते— आधेयचरणाक्रान्तो यदि वै दक्षिणः करः । सञ्चारो विहितो वामे त्वक्षसूत्रस्य वै तदा ॥ —(१२।१८९-१९०) इत्युक्तेः । ननु— स्वस्वाङ्गुष्ठद्वयप्रोतगणित्रोभयपाणिना । पुष्पाञ्जलिधराः सर्वे मुख्येन विहगोत्तमाः ॥ —(ई०सं० ८।४८, पा०सं० ८।४७-४८) इतीश्वरपारमेश्वरोक्तेः करद्वयेऽप्यक्षसूत्रधारणं स्यात्, किन्तु दक्षिणहस्ते भग- वच्चरणाक्रान्ते सति तदा वामहस्तस्थितस्याक्षसूत्रस्य सञ्चारो गणनार्थं सञ्चालनं स्यादित्यर्थः सरस इति चेन्न, आधेयचरणाधःस्थं यस्य पाणितलद्वयम् । निरस्तसूत्रं तं विद्धि वाहनं भगवन्मयम् ॥ —(१२।१९०-१९१) इति वचनविरोधात् । भ(ग?) वदुक्तार्थे सिद्धे निरस्तसूत्रसञ्चारं तं विद्धीति वचनं (कथं) प्रवर्तेत । स्वस्वाङ्गुष्ठद्वयप्रोतगणित्रोभयपाणिनेत्यत्रापि पुष्पाञ्जलिप्रकरणाद- ङ्गुष्ठद्वयप्रोतमेकमेवाक्षसूत्रमिति ज्ञायते । यद्वा दक्षिणे वामे वाऽङ्गुष्ठेऽक्षसूत्रं धार्यमिति ज्ञापनार्थमङ्गुष्ठद्वयमप्युक्तमिति ज्ञेयम् । सुपर्णस्य भुजद्वयं मुख्यहस्तद्वयमेवमेव सत्योक्तलक्षणमेवेत्यर्थः । अपरो वामः