भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

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२७६ सात्वतसंहिता आविश्याऽऽस्तेऽशमात्रेण कृपया स जगत्प्रभुः ॥ १०१ ॥ स विवेकात्मना भूत्वा ज्ञानबाहुवितानधृक् । ऐश्वर्यधर्मवैराग्यशमास्यश्चितिशक्तिभृत् ॥ १०२ ॥ आदाय संयमास्त्रौघं नियमास्त्रगुणं तथा । इन्द्रियादिगणं जित्वा कर्मिणां दोषदो हि यः ॥ १०३ ॥ यदस्य सुरजिद्रूपं तद् द्वादशभुजं स्मरेत् । दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्याभरणभूषितम् ॥ १०४ ॥ चतुर्वक्त्रं सुनयनं वामोत्सङ्गार्पितप्रियम् । खड्गं चक्रं गदां बाणं मुसलं च तरूत्तमम् ॥ १०५ ॥ षट्सु दक्षिणहस्तेषु शङ्खमङ्कुशकार्मुके । छत्रं च फणभृत्पाशं विभोर्वामभुजेष्वमी ॥ १०६ ॥ षष्ठेनालिङ्गिता देवी सारविन्देन बाहुना । तदं(श?स)लग्नकरया देव्या तच्चित्तयाऽनिशम् ॥ १०७ ॥ संवीज्यमानं विनयाच्चामरेण सितेन तु । पारिजातहरध्यानमाह—देव आम्रफलाभ इत्यादिभिः । दोषदो दोषच्छेदक इत्यर्थः । “दो अवखण्डने” (१।९४८दि०) इति धातोः । अस्य स्थानं तु पौष्करे— आसाद्य सूकरक्षेत्रं देवो गरुडवाहनः । संस्थितो गरुडारूढः पारिजातकराङ्कितः ॥ सिद्धैः सुरगणैः सार्धं गगने चापि पौष्कर ॥—(३६।३५३-३५४) इति ॥ ९८-१०८ ॥ अब पारिजातहर विष्णु का ध्यान कहते हैं—पारिजात हरण करने वाले, आम्रफल के समान आभा वाले, अक्लिष्ट कर्मा, अनेक अद्भुत कर्म करने वाले देवों के स्वामी का स्मरण करना चाहिये । जो बन्धन में बँधे हुए देहधारी भक्तों के हृदय में उत्पन्न हुए हैं, अनित्य हैं, अनुरञ्जक हैं, न्यग्रोध (= गूलर) के वृक्ष के समान विशाल हैं, जो अविद्या से बाँधने वाले हैं, जो मोहमाया से समाहत करने वाले हैं तथा जो अत्यन्त विस्तृत हैं, उस कर्मवृक्ष को उखाड़कर फेंकने के लिये जो प्रभु हैं और अनुग्राह्यजनों के भीतर कृपापूर्वक प्रविष्ट होकर विवेक स्वरूप से जो स्थित हैं, ज्ञान-बाहुरूप वितान धारण कर ऐश्वर्य, धर्म, वैराग्य, शान्त मुख वाले चिति शक्ति धारण करते हैं, संयमास्त्र समूह तथा नियमास्त्र समूह हाथ में लेकर इन्द्रिय गणों को जीत कर, समस्त दोषों को नष्ट कर देते हैं । जो इनका द्वादश भुजा वाला सुरजित् रूप है, उसका स्मरण करना चाहिये । उनके चार नेत्र हैं, अपने बायें उत्संग में प्रियतमा को बिठाये हुए हैं, अपने छः दक्षिण