सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादशः परिच्छेदः २७५ वाले हैं, जिनके नेत्र कमल के समान विशाल हैं और मध्याह्न भास्कर के समान जो तेजस्वी हैं, जो द्वादश अरों के समान करों से समुद्यत हैं, जो नितम्ब प्रदेश पर स्थित अपने बायें हाथ से पृथ्वी पर रखी हुई गदा को धारण किये हुए हैं, ऐसे राहुजित् भगवान् का ध्यान करना चाहिये ॥ ८८-९३ ॥ १९. कालनेमिघ्नध्यानकथनम् अविद्याख्या च या नेमिः कालचक्रस्य दुर्धरा॥ ९३ ॥ सामाधीयं समाश्रित्य विग्रहं विधुनोति च। जपयज्ञक्रियादीनां तामसेन बलेन च॥ ९४ ॥ ध्यायेत् तत्प्रसरघ्नं च देवं राजोत्पलद्युतिम् । विज्ञानरश्मिभिर्दीप्तं सत्सत्त्वगरुडासनम् ॥ ९५ ॥ नानाश्ररूपभूतात्मसद्विद्याभुजभूषितम् । चक्रं पद्मं गदां बाणमङ्कुशं कुन्तमेव च॥ ९६ ॥ षट्सु दक्षिणहस्तेषु शक्तिं पाशौ च कार्मुकम् । मुसलं मुद्गरं भीमं खेटकं वामबाहुषु ॥ ९७ ॥ कालनेमिघ्नध्यानमाह—अविद्याख्येत्यादिभिः ॥ ९३-९७ ॥ अब कालनेमिघ्न का ध्यान कहते हैं—कालचक्र की दुर्धरा अविद्या नामक नेमि है, जो समिधा का आश्रय लेकर अपने तामस बल से विग्रह को नष्ट करती है। ऐसे जप, यज्ञ, क्रिया के प्रसार को नष्ट करने वाले, कमल के समान प्रकाशक का ध्यान करना चाहिये । जो विज्ञान रश्मियों से उद्दीप्त हैं, सत्सत्त्व गरुडासन पर विराजमान हैं, जो अनेक अस्त्रों से भूतात्मा हैं, सद्विद्या रूप भुजाओं से भूषित हैं, जिनके छः दाहिने हाथों में चक्र, पद्म, गदा, बाण, अङ्कुश और कुन्द तथा ६ बायें हाथों में शक्ति, पाश, कार्मुक, मुसल, मुद्गर, भीम और खेटक है ॥ ९३-९७ ॥ २०. पारिजातहरध्यानकथनम् देव आम्रदलाभश्च स्मर्तव्यः पारिजातजित् । अक्लिष्टकर्मा देवेशस्त्वनेकाद्भुतविक्रमः ॥ ९८ ॥ प्रबन्धप्रतिपन्नानां भक्तानामपि देहिनाम् । यो बोधभूमौ संरूढो ह्यनित्यश्चानुरञ्जकः ॥ ९९ ॥ न्यग्रोधविटपाकारोऽप्यविद्याबन्धलक्षणः । कर्मवृक्षः सुविततो मोहमायाफलावृतः ॥ १०० ॥ तदुत्पाटनसिद्ध्यर्थमनुग्राह्यजनं सदा।