सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७४ सात्वतसंहिता भवद्भावौ तदा तत्र रूपे तुल्योपलक्षितौ । देवैः पुरुषरूपेण स्त्रीरूपेण सुरेतरैः ॥ सह सिद्धं मयीत्येतज्जन्म मे महदद्भुतम् ॥ (८।४८-५०) इति ॥ ८५-८८ ॥ अब कान्तात्मा का ध्यान कहते हैं—जिनके नेत्र मद से विह्वल है, जिनमें यौवन प्रगट हो रहा है, जिनकी कान्ति विकसित कमल के समान हैं, जिन्होंने स्त्री रूप धारण करके भी अपनी स्मृति का त्याग नहीं किया है । ऐसे त्रैलोक्य विस्मयकारी स्त्री रूप धारण करने वाले कान्तात्मा का ध्यान करना चाहिये । जो चन्द्रमण्डल के समान आनन्दामृत से पूर्ण मुख वाले और हाथ में कलश लिये हुए अपने लीला कटाक्षरूपी बाणों से असुरों का वध कर रहे हैं तथा द्विरेफ (भ्रमर से) लिपटी हुई सहकार युक्त लता जिनके हाथ में है ऐसे कान्तात्मा का ध्यान करे ॥ ८५-८८ ॥ १८. राहुजित् ध्यानकथनम् कलामूर्त्त्यभिमानात्मा राहुसंज्ञो विभीषणः ॥ ८८ ॥ मूर्त्तामूर्तेन रूपेण संग्रसत्यनिशं किल । अग्नीषोममयीं मूर्तिं कर्मिणामुपकारिणीम् ॥ ८९ ॥ योऽन्तः प्राणादिरूपेण चन्द्रादित्यात्मना बहिः । स्थितस्तद्विजयेऽध्यक्षः सत्यध्यानरतात्मनाम् ॥ ९० ॥ निष्पन्दं बोधभावेन तं तु व्यक्तं स्मरेद् बहिः । नीलनीरदवर्णाभं पद्मपत्रनिभेक्षणम् ॥ ९१ ॥ मध्याह्नभास्कराकारं द्वादशारकरोद्यतम् । श्रोणीतटनिविष्टेन वामहस्तेन लीलया ॥ ९२ ॥ ध्रियमाणं गदां गुर्वी निषण्णां धरणीतले । राहुजिद्ध्यानमाह—कलामूर्तीत्यादिभिः । अस्यापि क्षीरोदकक्षितिक्षेत्रवासित्व- मेव बोद्धव्यम्, "सिद्धानां च मुनीनां च देवानां मृत्युजित् स्थितः" (३६।३४६) इति पौष्करोक्तेः ॥ ८८-९३ ॥ अब राहुजित् का ध्यान कहते हैं—जो कलामूर्त्ति के अभिमानी देवता है, सबको भयभीत करने वाले हैं, जिनका नाम राहुजित् है, जो मूर्त्त अमूर्त्त दोनों रूपों से संसारी जनों का उपकार करने वाली अग्निमयी एवं सोममयी मूर्त्ति को नित्य ग्रसता रहता है, जो भीतर प्राणादि रूप से तथा बाहर चन्द्रादित्य रूप से स्थित हैं और सत्य ध्यान में निरत रहने वालों के विजय में अध्यक्ष रूप से स्थित है, जो बोध भाव से निष्पन्द (स्थिर) है, जो नीले बादल के समान कृष्णवर्ण की आभा