भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

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द्वादशः परिच्छेदः २७३ १६. श्रीपतिध्यानकथनम् ध्यायेत् कनकगर्भाभं देवदेवं श्रियःपतिम् । कमलालयहेतीशविभूषितकरद्वयम् ॥ ८१ ॥ द्वयं देवीपरिणये लीलयैव समर्पयन् । प्रकाशयन्ननादित्वमात्मनः प्रकृतेः सह ॥ ८२ ॥ मत्करैरनुविद्धेयं प्रकृतिः प्राकृतैरहम् । यतोऽहमाश्रयश्चास्या मूर्तेर्मय्येतदात्मिका ॥ ८३ ॥ यामालम्ब्य सुखेनेमं दुस्तरं हि गुणोदधिम् । निस्तरन्त्यचिरेणैव व्यक्तं ध्यानपरायणाः ॥ ८४ ॥ श्रीपतिध्यानमाह—ध्यायेदित्यादिभिः । "प्रकृतिर्जगन्माता लक्ष्मीः" (पृ० ३५१) इति सहस्रनामभाष्ये व्याख्यातम् ॥ ८१-८४ ॥ अब श्रीपति का ध्यान कहते हैं—कनक के समान कान्तिमान् देवाधिदेव श्रीपति लक्ष्मीनारायण का ध्यान करना चाहिये, जिनके दोनों हाथ कमलालय, पद्म और हेतीराट् सुदर्शन चक्र से विभूषित हैं ॥ ८१ ॥ भगवान् श्रीपति ने देवी परिणय काल में इन दोनों को समर्पित करते हुए प्रकृति के साथ अपना अनादित्व प्रकट करते हुए कहा था कि यह प्रकृति हमारे हाथ में अनुविद्ध है तथा प्रकृति तत्त्व से मैं अनुविद्ध हूँ क्योंकि मैं इस श्री की मूर्त्ति का आश्रय हूँ और एतदात्मिका मूर्त्ति मैं हूँ जिस मूर्त्ति का आश्रय ले कर लक्ष्मीनारायण में ध्यान परायण भक्त थोड़े ही काल में इस दुस्तर गुणोदधि को सुख से पार कर लेते हैं, ऐसे श्रीपति का ध्यान करना चाहिए ॥ ८१-८४ ॥ १७. कान्तात्मध्यानकथनम् मदविह्वलनेत्रं च देवमुद्भिन्नयौवनम् । फुल्लरक्ताम्बुजाभासमत्यजन्तं निजां स्मृतिम् ॥ ८५ ॥ त्रैलोक्यविस्मयकरं कान्ताकृतिधरं स्मरेत् । आनन्दामृतसम्पूर्णवदनेनेन्दुकान्तिना ॥ ८६ ॥ कलशाकृतिरूपेण करस्थेन विराजितम् । लीलाकटाक्षवाग्बाणैः सूदयन्तं सुरद्विषः ॥ ८७ ॥ द्विरेफपटलाक्रान्तसहकारलताकरम् । कान्तात्मध्यानमाह—मदविह्वलनेत्रैरिति सार्धैस्त्रिभिः । अस्यावतारस्य लक्ष्मी- नारायणोभयात्मकमुक्तं जगज्जनन्या— यत्तु तन्मोहनं रूपं श्रूयतेऽमृतधारकम् ॥