भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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द्वादशः परिच्छेदः ३०१ दण्डं दक्षिणहस्तैस्तु धत्तेऽष्टादशबाहुधृक् । शङ्खाभयौ हलं शक्तिं मुद्गरं मुसलं धनुः ॥ २३० ॥ कुठारमतुलं पाशं विभुर्वामभुजैरमूर्न् । बिभर्ति दुष्टशान्त्यर्थं साधूनां पालनाय च ॥ २३१ ॥ षड्भुजादीनामायुधभेदानाह—तन्मे शृणु यथावस्थमित्यारभ्य साधूनां पालनाय चेत्यन्तम् ॥ २२१-२३१ ॥ अब अस्त्रविन्यास से चिह्नित यथावस्था उनके स्वरूपों को सुनिये—षड्भुज अपने दाहिने हाथ में त्रिशूल, कमल एवं गदा, तथा तीन बायें हाथों में बाण सहित धनुष तथा शङ्ख धारण करते हैं। अष्टबाहु अपने दाहिने चार हाथों में गदा, मुसल, चक्र एवं तलवार तथा चार बायें हाथ में शङ्ख, अङ्कुश, पाश तथा सशर धनुष धारण करते हैं। दशबाहु अपने हाथों में धनुष, शङ्ख, चक्र, खड्ग और अभय धारण करते हैं। द्वादश भुजाओं वाले अपने छह दाहिने हाथों में कमल, खड्ग, चक्र, बाण, गदा, अङ्कुश, एवं बायें हाथों में शङ्ख, पाश, अभय, शक्ति, मुशल और धनुष धारण करते हैं ॥ २२१-२२५ ॥ चतुर्दश भुजा वाले अपने बायें भुजसप्तक में शङ्ख, गदा, अङ्कुश, पाश, मुसल, मुद्गर, हल एवं दाहिने हाथों में दण्ड, अब्ज, कुलिश, चक्र, खड्ग, शक्ति तथा परशु धारण करते हैं। षोडश भुजा वाले अपने मुख्य हाथों में मुद्गर, अभय, कमल, खड्ग, शक्ति, दण्ड, वर, अङ्कुश, तथा बायें हाथ में शङ्ख, चक्र, गदा, वज्र, पाश, लाङ्गल (=हल), कार्मुक एवं वर मुद्रा धारण करते हैं ॥ २२६-२२८ ॥ विश्वजित् अपने बायें कराष्टक में पद्म, खड्ग, गदा, वज्र, चक्र, बाण, वर, अङ्कुश और दण्ड तथा वही अष्टादशबाहु धारण करने वाले विश्वजित् अपने दाहिने हाथ में शङ्ख, अभय, हल, शक्ति, मुद्गर, मुसल, धनुष, अतुल कुठार, एवं पाश धारण करते हैं। वे विश्वभुज दुष्टों की शान्ति के लिये तथा साधुओं के पालन के लिये इन अस्त्रों को धारण करते हैं ॥ २२९-२३१ ॥ भूयो विशेषरूपाणि त्वेतान्येव विशेषतः । स्ववक्त्रद्वयमात्रेण नयत्यमितविक्रमः ॥ २३२ ॥ उक्तान्येतानि रूपाणि पुनर्वक्त्रद्वयमात्रेण विशेषत्वं प्रापयतीत्याह—भूय इति ॥ २३२ ॥ सिंहतेजोऽसहिष्णूनां पितृयाणरतात्मनाम् । अङ्गनादिसंसारभीतानां वै हिताय च ॥ २३३ ॥ आमृते वै ग्रहे भागे तैजसे नित्यदक्षिणे । वामदक्षिणवक्त्राभ्यां कुर्याद् वै व्यत्ययं प्रभुः ॥ २३४ ॥ वृद्धयेऽपि च शान्त्यर्थं तेजसः पद्मलोचन ।