सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०२ सात्वतसंहिता दक्षिणोत्तरवक्त्रयोर्व्यत्यासभेदमाह—सिंहेति सार्धद्वाभ्याम् । स्वदक्षिणभाग- स्यैव तेजोमयत्वात् पुनस्तत्रातितेजोमयं सिंहवक्त्रमप्यस्ति चेत्, उपासकास्तदुभयं तेजः संमिलितं सोढुं न शक्नुवन्तीति तेषां मुमुक्षूणामुपासकानां हितार्थं तेजोमयं सिंहवक्त्रममृतम(यैः ये) स्ववामभागे, वराहमुखं तैजसे दक्षिणभागे च प्राप्नोतीति भावः ॥ २३३-२३५ ॥ हेतुनानेन भगवान् बहिरन्तर्गतिन वै ॥ २३५ ॥ अग्नीषोमौ समीकृत्य त्वास्ते साधारणात्मना । व्यक्तं वागीशवक्त्रं तु नीत्वैवं शिरसोपरि ॥ २३६ ॥ एवं मुखद्वयव्यत्ययेन हेतुना समीकृततेजोऽमृतमयविग्रहः सन् सर्वसेव्यो भवती- त्याह—हेतुनेति ॥ २३५-२३६ ॥ पञ्चवक्त्रेण वपुषा त्वामूलाद् यात्यनेकधा । शब्दब्रह्मरतानां च ध्यायिनामात्मसिद्धये ॥ २३७ ॥ शब्दब्रह्मासक्तोपासकानुग्रहार्थमूर्ध्वचतुर्मुखमध्ये हयग्रीववक्त्रं च बिभर्तीत्याह— व्यक्तमिति सार्धेन ॥ २३६-२३७ ॥ यहाँ तक विष्णु के सभी रूपों को कह दिया गया है । इनमें विशेषता यही है कि अमित पराक्रम वाले विष्णु अपने दोनों मुखों से ही इतने रूपों को धारण करते हैं, जो सिंह का तेज सहन करने में असमर्थ हैं, पितृयाण में अधिक रुचि रखने वाले हैं और जो अङ्गनादि से संसार में भयभीत हैं, उनके हित के लिये वे ऐसा करते हैं । यतः उन विश्वजित का दक्षिण भाग अत्यन्त तेजोमय है । वहीं अत्यन्त तेजोमय सिंह मुख भी है । उपासक उन सम्मिलित दोनों तेजों को सहन नहीं कर सकते । इसलिये उनकी भलाई के लिये अपना तेजोमय सिंहमुख एवं वराहमुख वाले वामभाग में और वराहमुख तेज के लिये अपने दक्षिण भाग में कर देते हैं । ऐसा करने से दोनों भाग का तेज सम हो जाता है । यही विशेषता है, एक ओर तेज की अभिवृद्धि और दूसरी ओर तेज की शान्ति हो जाती है । इस प्रकार अग्नीषोमात्मक दोनों तेजों को बराबर कर साधारण एवं सर्व सामान्य मार्ग में स्थित हो जाते हैं । शब्दब्रह्म में आसक्त उपासकों की आत्मसिद्धि के लिये वे परमात्मा, ऊपर के अपने चार मुखों में, अपने हयग्रीव मुख को, शिर के ऊपर धारण कर, पाँच मुख वाले शरीर से वे प्रभु अनेक प्रकार के होते हैं ॥ २३२-२३७ ॥ आ पातालाच्च सर्वेषां लोकानां पूरणाय च । नानावपुर्धरो भूयस्त्वेकैकेनैष याति च ॥ २३८ ॥ भेदेन रूपमाश्रित्य दशधा च सितादिकम् । विना वक्त्रैर्नृसिंहाद्यैः सर्वज्ञमहिमान्वितः ॥ २३९ ॥ वर्णभेदं चाह—आपातालादिति सार्धेन । पातालादिसमस्तलोकेषु स्वयमेव