भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

पृष्ठ 363, कुल 837 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 363

३०४ सात्वतसंहिता चारों वर्णों के चार योनिज वर्ण शुक्ल, रक्त, पीत एवं नीलादि हैं वे अन्य मूर्त्तियों में भी हो जाते हैं। आदि मूर्ति चतुर्भुज विष्णु में तथा अन्य मूर्त्तियों में वर्ण एवं लाञ्छन समान होता है। किन्तु उनमें लाञ्छन से भेद न होकर ध्वजा से भेद होता है ॥ २४२-२४३ ॥ अपसव्यस्थितेनैव तत्तालाख्यध्वजेन तु । स्वरूपभेदमाप्नोति स्वमूर्त्तिः सह सर्वदा ॥ २४४ ॥ सर्वत्रैवं तद्दक्षिणभागस्थध्वजेन तन्मूर्तिभेदो ज्ञेय इत्याह—अपसव्येति ॥२४४॥ यस्मात् कार्यवशेनैव मूर्तीनामपि पाणिगाः । चतुःपद्मादयोऽमूर्ता मूर्ताः शान्तास्तथोधताः ॥ २४५ ॥ ॥ इति श्रीपाञ्चरात्रे श्रीसात्वतसंहितायां विभवदेवताध्यानं नाम द्वादशः परिच्छेदः ॥ १२ ॥ — ❦ ❖ ❧ — तत्र हेतुमाह—यस्मादिति । वासुदेवादिनां हस्तस्थितपद्मादिलाञ्छनानि प्रकृत- कार्यानुसारेण कदाचित् शान्तरूपमङ्गीकृत्यामूर्तानि भवन्ति, कदाचिदिच्छारूपमङ्गीकृत्य मूर्तीभूतानि भवन्ति । तस्माल्लाञ्छनैर्भेदो न ज्ञायते, तत्तद्ध्वजेनैव तत्तन्मूर्तिभेदो ज्ञातव्य इत्यर्थः ॥ २४५ ॥ ॥ इति श्रीमौज्यायनकुलतिलकस्य यदुगिरीश्वरचरणकमलार्चकस्य योगानन्दभट्टाचार्यस्य तनयेन अलशिङ्गभट्टेन विरचिते सात्वततन्त्रभाष्ये द्वादशः परिच्छेदः ॥ १२ ॥ — ❦ ❖ ❧ — यतः वासुदेवादि हस्तस्थ पद्मादि लाञ्छन प्रकृत कार्य के अनुसार कभी शान्तरूप अङ्गीकार कर अमूर्त रूप होते हैं और कभी इच्छा रूप अङ्गीकार कर मूर्त्त स्वरूप हो जाते हैं। इसलिए लाञ्छन से भेद नहीं जानना चाहिये। इस प्रकार ध्वज से ही मूर्त्तिभेद जानना चाहिये ॥ २४४-२४५ ॥ ॥ इस प्रकार डॉ० सुधाकर मालवीय कृत सात्त्वत संहिता के विभवदेवताध्यान नामक द्वादश परिच्छेद की हिन्दी समाप्त हुई ॥ १२ ॥ — ❦ ❖ ❧ X —