भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

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पृष्ठ 365

३०६ सात्वतसंहिता किरीटध्यानकथनम् किरीटः सौम्यवदनः काञ्चनाभो महातनुः ॥ ३ ॥ भाभिराकृतियुक्ताभिर्नानारूपाभिरावृतः । स्थितो वैद्याधरीयेण स्थानकेनान्तरिक्षगः ॥ ४ ॥ किरीटध्यानमाह—किरीट इति सार्धेन ॥ ३-४ ॥ अब सर्वप्रथम किरीट का स्वरूप कहते हैं—किरीट का मुख सौम्य है, कान्ति कनक की आभा के समान है, शरीर विशाल है, वे अपनी देदीप्यमान आभा युक्त आकृति से नाना रूप धारण करने वाले हैं । वे अपनी रुचि के अनुसार अकेले अन्तरिक्ष में निवास करते हैं ॥ ३-४ ॥ कौस्तुभध्यानकथनम् पद्मरागाचलाकारं कौस्तुभं रत्ननायकम् । दिशो दश द्योतयन्तं संलग्नाङ्घ्रिस्थितं स्मरेत् ॥ ५ ॥ वहन्तं वक्षसो मध्ये स्वहस्तकृतसम्पुटम् । सन्धारयन्तमपरं तथा वै शिरसोपरि ॥ ६ ॥ कौस्तुभध्यानमाह—पद्मरागेति द्वाभ्याम् ॥ ५-६ ॥ कौस्तुभ का लक्षण कहते हैं—रत्ननायक कौस्तुभ पद्मराग के पर्वत के समान दशों दिशाओं को प्रज्वलित करते हुए तथा भगवान् के पैर का स्पर्श करते हुए स्थित हैं इस प्रकार उनका ध्यान करना चाहिये ॥ ५ ॥ भगवान् स्वयं उस कौस्तुभ (मणि) को अपने हाथ के सम्पुट में स्थापित कर अपने वक्षस्थल के मध्य में धारण करते हैं तथा दूसरी कौस्तुभ की माला शिर के ऊपर धारण किये हुए हैं ॥ ६ ॥ श्रीवत्सध्यानकथनम् स्फटिकाद्रिप्रतीकाशं श्रीवत्समथ भावयेत् । बद्धपद्मासनासीनं न्यस्तहस्तं स्वपार्श्वयोः ॥ ७ ॥ श्रीवत्सध्यानमाह—स्फटिकेति सार्धेन । कूर्ममुद्रा अविद्यादलिनी मुद्रेत्यर्थः, “अविद्यादलिनीं मुद्रां कूर्माख्यां संस्मरेद् विभोः” (१७।८४) इति नृसिंहकल्पे वक्ष्यमाणत्वात् । तल्लक्षणमपि तत्रैव वक्ष्यमाणं ज्ञेयम् ॥ ७-८ ॥ श्रीवत्स का लक्षण—स्फटिकमणि के पर्वत के समान चमकीले श्रीवत्स का ध्यान करना चाहिये जो पद्मासन से बैठे हुए है और अपने दोनों पार्श्वभाग पर हाथ रखे हुए हैं ॥ ७ ॥