सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०८ सात्वतसंहिता शक्रकार्मुकवर्णं च परशुं भीमविक्रमम् ॥ २० ॥ द्रवतकनकनेत्रं च ज्वलज्ज्वालाजटाधरम् । पाशं फणिगणाकीर्णं विद्युज्जिह्वं भयानकम् ॥ २१ ॥ हेमालिपाण्डराभं च घोरास्यं रक्तलोचनम् । कृशाङ्गं दीर्घबाहुं च पिङ्गलाक्षं तु चाङ्कुशम् ॥ २२ ॥ विकरालमुखं रौद्रं भिन्नाञ्जनगिरिप्रभम् । मुद्गरं शतधामाभं पीनांसं पृथुविग्रहम् ॥ २३ ॥ जटाकलापधृक् सौम्यं पुण्डरीकनिभेक्षणम् । वज्रं वज्रोपलाभं तु सितदीर्घनखाङ्कितम् ॥ २४ ॥ दंष्ट्राकरालवदनं ज्वलत्कनकलोचनम् । सौदामिनीं प्रभाशक्तिं शान्ताग्निवदनेक्षणाम् ॥ २५ ॥ घनघर्घरनिर्घोषमुद्गिरन्तीं मुहुर्मुहुः । चक्रादिशक्त्यन्तानां सप्तदशायुधानामेकैकस्यैकश्लोकक्रमेण ध्यानमाह—स्व- रश्मिमण्डलान्तःस्थमित्यादिभिः सप्तदशभिः ॥ ९-२६ ॥ चक्रादि सत्रह आयुधों का ध्यान—अब चक्रादि सप्तदश आयुधों का क्रमश एक-एक श्लोक में लक्षण कहते हैं। १. हेतिप (= चक्र) का ध्यान—अपने अन्तःस्थित रश्मिमण्डल से समस्त दिशाओं को प्रकाशित करते हुए चक्र का ध्यान करना चाहिये, जो सर्वदा भगवान् की आज्ञा की प्रतीक्षा में निरत है, जिनका अङ्ग अत्यन्त ह्रस्व है तथा नेत्र रक्त वर्ण के हैं ॥ ९ ॥ २. कमल का ध्यान—जो कुन्द के समान अत्यन्त धवल है, सौम्य है, जिसका मुख मण्डल ईषात्सित है जो श्रोत्रेन्द्रिय को सुख देने वाले मधुर शब्द करने वाला है, ऐसे कमल का स्मरण करे ॥ १० ॥ ३. गदा का ध्यान—हेमाद्रि के समान स्वच्छ वर्ण वाली, कुवलय के समान नेत्रों वाली, अत्यन्त तन्वी गदा का स्मरण करे जो अपने में उत्पन्न प्रकाश से समस्त आकाश मण्डल को देदीप्यमान कर रही है ॥ ११ ॥ ४. शङ्ख का ध्यान—हिमालय के समान स्वच्छ शङ्ख हैं, जिसके कमल के समान नेत्र हैं तथा जो समस्त उत्तम शास्त्रों के सार को अपने मुख से उगलते रहते हैं ॥ १२ ॥ ५. हल का ध्यान—सन्ध्याकालीन बादल के समान भयानक नेत्रों वाला जिन भगवान् का लाङ्गल (हल) है, जिनका शरीर तो अत्यन्त कृश है किन्तु नासिका उन्नत है । शरीर वज्र जैसा दृढ़ एवं बलवान् है ॥ १३ ॥