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सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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त्रयोदशः परिच्छेदः ३१५ भोक्तृशक्तिः स्मृता लक्ष्मीः पुष्टिर्वै कर्तृसंज्ञिता ॥ ४९ ॥ भोगार्थमवतीर्णस्य तस्य लोकानुकम्पया । उदितं सह तेनैव शक्तिद्वितयमव्ययम् ॥ ५० ॥ नानात्वेन हि वै यस्य परिणामः प्रकीर्तितः । श्रीपुष्टिद्विकस्य लक्षणमाह—श्रीपुष्ट्याख्यद्वयमिति सार्धैश्चतुर्भिः । यस्य शक्तिद्वयस्य परिणामो नानात्वेन प्रकाशितः, चिन्ताकीर्तिजयामायादिरूपभेदैः प्रदर्शित इत्यर्थः ॥ ४७-५१ ॥ श्री, पुष्टि दो और शक्तियाँ हैं जो क्रमशः नारायण के दक्षिण और उत्तर रहती हैं । ये दोनों ही गरुड़ के पक्ष पर पद्मासन से बैठी रहती हैं ॥ ४७ ॥ एक के हाथ में कमलिनी का नाल है, तो दूसरे के हाथ में कोमल जल कलश है । सर्वत्रव्यापी भगवान् का सर्वप्रथम होने वाला जो अग्नीषोममय देह है । उनकी दो शक्तियाँ हैं । एक परस्पर मिली हुई और दूसरी परस्पर भिन्न हैं । उसमें लक्ष्मी भोक्त्री शक्ति हैं और दूसरी पुष्टि शक्ति हैं, जिन्हें कर्मी शक्ति भी कहा जाता है ॥ ४८-४९ ॥ जब भगवान् लोक पर अनुग्रह करने के लिये भोग के लिये पृथ्वी पर अवतीर्ण होते हैं तो वे अव्यय प्रभु इन्हीं दोनों शक्तियों के साथ अवतरित होते हैं । इनकी इन्ही दो शक्तियों का परिणाम चिन्ता, कीर्ति, दया, जया तथा माया आदि रूपों में अनेक प्रकार से कहा जाता है ॥ ४९-५१ ॥ दिक्पत्रचतुरन्तःस्थं यद् वै देवीचतुष्टयम् ॥ ५१ ॥ शक्तिः परशुपाशास्रमङ्कुशं तत्करे क्रमात् । लक्ष्मीकीर्त्यादिशक्तिचतुष्टयलक्षणमाह—दिक्पत्रेति ॥ ५१-५२ ॥ चारों दिक्पत्रों के अन्त में जो चार शक्तियाँ स्थित हैं उनके हाथ में क्रमशः परशु, पाश, अस्त्र और अङ्कुश है ॥ ५१-५२ ॥ षट्कं केसरजालस्थं तत्र प्राक्पश्चिमे द्वयम् ॥ ५२ ॥ द्वयं द्वयं सौम्ययाम्ये तासां वामकरेषु च । शङ्खं चक्रं गदा सीरमिष्वस्त्रं नन्दकं शिवम् ॥ ५३ ॥ शुद्ध्य्यादिदेवीलक्षणमाह—षट्कमिति सार्धेन । प्राक्पश्चिमे द्वयम् । प्राग्भागे एका शक्तिः, पश्चिमभागे एका शक्तिरित्यर्थः । द्वयं द्वयं सौम्यायाम्ये । उत्तरकोणद्वये शक्तिद्वयम्, दक्षिणकोणद्वये शक्तिद्वयमित्यर्थः । तथा च लक्ष्मीतन्त्रे—"तस्यैव कोणषट्कस्था षोढाऽहं शृणु नाम च" (८।२३) इति ॥ ५२-५३ ॥ अब शुद्ध्य्यादि देवियों के लक्षण कहते हैं—केशर जाल में छह शक्तियाँ

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