सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१६ सात्वतसंहिता है जिसमें पूर्व और पश्चिम में एक-एक क्रम से दो शक्ति, उत्तर और दक्षिण में दो-दो और इनके वाम हस्त में शङ्ख, चक्र, गदा, हल, बाण एवं नन्दक नामक अस्त्र हैं ॥ ५३ ॥ शक्त्यष्टकलक्षणकथनम् पत्रमध्यनिविष्टं तु यत्कान्ताष्टकमुत्तमम् । तस्य वामकराणां च विज्ञेयं त्वादितोऽष्टकम् ॥ ५४ ॥ श्रीफलं चाक्षसूत्रं स्रग् दर्पणः पुष्पमञ्जरी । विष्टरं किङ्किणी चास्त्रसञ्चयः कमलेक्षण ॥ ५५ ॥ शक्त्यष्टकलक्षणमाह—पत्रमध्येति द्वाभ्याम् । श्रीफलं = विल्वफलमित्यर्थः ॥ ५४-५५ ॥ अब शक्त्यष्टक के लक्षण कहते हैं—पत्र के मध्य में जो आठ (शक्तियाँ) कान्तायें सन्निविष्ट की गई हैं, उनके बायें हाथ में भी आठ वस्तुयें इस प्रकार सन्निविष्ट हैं । (१) श्री फल, (२) अक्षसूत्र, (३) माला, (४) दर्पण, (५) पुष्पमञ्जरी, (६) विष्टर, (७) किङ्किणी, (८) अस्त्र सञ्चय । हे कमलेक्षण ऐसा समझो ॥ ५४-५५ ॥ लक्ष्यादिद्विषट्कलक्षणम् विज्ञेयः शान्तिदः पाणिर्द्वादशानां तु साभयः । अन्तरान्तरयोगेन सर्वाश्चामरलाञ्छिताः ॥ ५६ ॥ स्वस्तिकेनोपविष्टाश्चाप्यन्तर्मुदितमानसाः । लक्ष्यादिद्विषट्कलक्षणमाह—विज्ञेय इत्यर्धेन । सर्वसाधारणं लक्षणमाह— अन्तरेति । अन्तरान्तरयोगेन दक्षिणहस्तधारणेनेत्यर्थः ॥ ५६-५७ ॥ अब इन लक्ष्यादि बारहों के सामान्य लक्षण कहते हैं—इन द्वादश महालक्ष्मियों के दाहिने हाथ में स्वास्तिक आदि माङ्गलिक वस्तुओं के धारण करने के कारण इनमें बारह हाथों को भी अभय देने वाला तथा शान्ति प्रदान करने वाला समझना चाहिये । ये सभी चिह्न देवचिह्नों से युक्त है । स्वास्तिक से युक्त है, सभी भीतर से प्रसन्नचित्त रहने वाले हैं ॥ ५६-५७ ॥ द्व्यादिकस्यास्य संघस्य द्वादशान्तस्य लाङ्गलिन् ॥ ५७ ॥ सितादिकेन वर्णेन लाञ्छनव्यत्ययेन तु । तुल्यलाञ्छनयोगेन तन्निरासे च वै सति ॥ ५८ ॥ वराभयाभ्यामन्योन्यपाणिभ्यामथ केवलात् । बहुधा भेदवृन्दं तु परिज्ञेयं तु पूर्ववत् ॥ ५९ ॥