भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 389

३३० सात्वतसंहिता पुंस्तत्त्वं = जीवात्मेत्यर्थः । तस्य वाचकं = जीवमन्त्रमित्यर्थः । हंसयुक्तं = हंसाक्षरयुक्तमित्यर्थः । द्विलक्षणं = पदद्वयात्मकमित्यर्थः । तथा च तन्मन्त्रोद्धारो जयाख्ये— अप्रमेयेण सूत्रेण व्योमाख्येनामृतेन च । परमेश्वरयुक्तेन त्रितारोक्तात्मना तु वा ॥ (७।२५) इति । अयमेवार्थः सुस्पष्टमुपबृंहितो लक्ष्मीतन्त्रे—"प्रत्यगात्मपरामर्शिशब्दः सोमोऽथ सर्गवान्" (३३।४७) इति । एवं च 'अहं सः' इति जीववाचकमन्त्रो ज्ञेयः । चित्त- पूर्वकमव्यक्तान्तं चतुष्टयं = मनोबुद्ध्यहङ्कारप्रकृत्याख्यं तत्त्वचतुष्टयमित्यर्थः । प्रणवादिन्मोन्तैः = स्वकैः पदैः ॐकारनमस्कारसम्पुटितैश्चतुर्थ्यन्तैस्तत्तन्नामभि- रित्यर्थः । कर्मेन्द्रियाणि = वाक्पाणिपादपायूपस्थानि । तन्मात्रपञ्चकं = शब्द- तन्मात्रादिपञ्चकम् । भूतानां पञ्चकम् = आकाशादिभूतपञ्चकम् । क्ष्मावसानि(का?कं) = पृथिव्यन्तमिति तद्विशेषणम् । अवशिष्टैस्तत्काण्डैः पञ्चविंशतिकाण्डेभ्योऽतिरिक्तैः कुशकाण्डैरित्यर्थः ॥ ५-१५ ॥ अब स्नान के लिये सर्वप्रथम कूर्चनिर्माण का प्रकार कहते हैं—जिसमें बहुत सी शाखायें हों, जो स्थूल हो, जो पुष्पित न हो ऐसे कुशों को पूर्वाभिमुख हो, प्रणव मन्त्र से, पृथ्वी से उखाड़ कर कुश मूल में भगवद् भावना कर भगवान् को स्थापित करे ॥ ५-६ ॥ उसका मध्यमनाल जो नीचे की ओर लटका हुआ है, उसमें महात्मा मन्त्रनाथ की आराधना कर उनसे व्याप्त होने की भावना करे ॥ ७ ॥ उसे सर्वाध्यक्ष परमात्मा का जीवात्म स्वरूप दूसरा विवर्त्त (= परिणाम) समझे । सभी काण्डों में जो अनेक गर्भों वाला सबसे ऊँचा काण्ड है, उसमें अणिमादि से युक्त पुंस्तत्त्व (जीव) की कल्पना करे । फिर उसमें जीव वाचक 'हंस' युक्त इन दो पदद्वयात्मक अक्षरों की कल्पना करे ॥ ८-९ ॥ फिर उसमें चित्तपूर्वक अव्यक्तान्त (मन, बुद्धि, अहङ्कार एवं प्रकृति) इन तत्त्व चतुष्टय की अधोमुख ॐकार तथा नमस्कार सम्पुटित चतुर्थ्यन्त तत्तन्नामों से ग्रथित करे ॥ १० ॥ इसी प्रकार वाक्पाणिपादपायूपस्थ को भी उनके नाम पञ्चक के साथ तथा शब्द-तन्मात्रादि पञ्चक को और आकाशादि पृथ्व्यन्त भूतपञ्चक को भी उसमें बाँध देवे । पचीस काण्ड से बचे हुए (कुश) काण्डों को एक में मिलाकर गोले के समान बाँध देवे । उन शेष काण्डों को इस प्रकार दृढ़ता से बाँधे जिससे वह पुनः ऊपर की ओर न उठे । जहाँ तक हो सके काण्ड की संख्या तत्त्व संख्या (२५) तक ही होनी चाहिये । इससे अधिक काण्ड संख्या होने पर उसमें किसी एक काण्ड के भग्न होने से अनर्थ उत्पन्न होने की संभावना रहती है । इसलिये उतने काण्ड को दृढ़ता के साथ बाँधे ॥ ११-१५ ॥