सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चदशः परिच्छेदः ३३१ दर्भमञ्जरिजं त्वेवं सम्पाद्यादौ पवित्रकम्। अनुसन्धीयते तत्र मन्त्रध्यानं यथास्थितम्॥ १६ ॥ पूजयित्वाऽर्घ्यपुष्पाद्यैरलङ्कृत्य पठेदिदम्। एवंविधं पवित्रं परिकल्प्य तत्र ध्यानपूर्वकं भगवन्तमभ्यर्च्य प्रार्थयेदित्याह— दर्भमञ्जरिजमिति सार्धेन। तीर्थबिम्बाद्यभावे त्वेवं दर्भपवित्रकल्पनं कार्यम्। तत्सत्त्वे तस्यैव तीर्थस्नानं बोध्यम्। तथा चेश्वरपारमेश्वर्योः— यथावत् स्नपन कुर्यात् तीर्थबिम्बे विशेषतः। नित्यस्नपनबिम्बे वा कुर्यात् तत्तदसन्निधौ॥ नित्योत्सवपरे बिम्बे ह्याचरेत् तदसन्निधौ। तदभावे पवित्रे तु दर्भमञ्जरिजे शुभे॥ इति। —(ई०सं० १४।२८०-२८१, पा०सं० १२।५३५-५३७) ॥ १६-१७ ॥ इस प्रकार साधक दर्भ की मञ्जरियों से पवित्री निर्माण करे। फिर उसमें मन्त्र का ध्यान कर मन्त्रनाथ की प्रतिष्ठा करे। फिर अर्घ्य पुष्पादि से अलङ्कृत कर यह प्रार्थना करे ॥ १६-१७ ॥ त्वमेव तीर्थं भगवंस्त्वमेवायतनं परम्॥ १७ ॥ त्वय्येवाधिष्ठितं सर्वमिति जानामि तत्त्वतः। तत्रापि च त्वयाऽऽदिष्टं क्रियाकाण्डं शुभप्रदम्॥ १८ ॥ यत्तन्निर्वाहयाम्यद्य त्वदनुग्रहकाम्यया। प्रार्थनाश्लोकद्वयमाह—त्वमिति ॥ १७-१९ ॥ प्रार्थना मन्त्र का अर्थ—हे भगवन्! आप ही महान् तीर्थ हो, आप महान् आयतन हो, सारी सृष्टि आप में ही अधिष्ठित है, इस बात को मैं तत्त्वतः जानता हूँ। फिर भी आपकी आज्ञा से इसे कल्याणकारी क्रिया काण्ड का आपका अनुग्रह प्राप्त करने के लिये आज इसका निर्वाह कर रहा हूँ ॥ १७-१९ ॥ एवं विज्ञाप्य भगवन्! मन्त्रमूर्तिं परावरम्॥ १९ ॥ तं पत्रपात्रगं कृत्वा ब्रह्मयानगतं तु वा। वेदगेयध्वनीशङ्खशब्दमङ्गलपूर्वकम् ॥ २० ॥ नीत्वा तीर्थान्तिकं तत्र तीरदेशे निधाय च। पूर्वमुखं च तं यानमथादाय पवित्रकम्॥ २१ ॥ वामहस्ततले कुर्यात् क्ष्मामण्डलगतां त्विव। विधृत्यान्मध्यभागाच्च पाणिना दक्षिणेन तु॥ २२ ॥ अवतीर्याम्भसो मध्ये निमज्जेत् सह तेन वै।