भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

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३३२ सात्वतसंहिता एवं विज्ञाप्य तत्पवित्रं ब्रह्मयाने वा समारोप्य वेदवाद्यघोषैः सह तीर्थसमीपं नीत्वा तत्र प्राङ्मुखमवरोप्य पवित्रमादाय वामकरतले भूमण्डलगतिमिव निधाय तन्मध्यं दक्षिणपाणिना गृहीत्वा तीर्थमध्येऽवतीर्य तेन सह स्नायादित्याह—एवमिति चतुर्भिः ॥ १९-२३ ॥ इस प्रकार परावर मन्त्रमूर्त्ति भगवान् से निवेदन कर उन्हें किसी पत्ते के पात्र में, अथवा किसी ब्रह्मयान में समारोपित कर वेद गान की ध्वनिपूर्वक शङ्ख बजाते हुए, माङ्गलिक जय-जयकार शब्द करते हुए, किसी तीर्थ स्थान में ले जाकर उसके तट पर उन्हें स्थापित करे। उस यान को पूर्वाभिमुख कर उसमें से उस पवित्रक को लेकर, अपने बायें हाथ पर भूमण्डल के समान स्थापित करे ॥ १९-२१ ॥ फिर अपने दाहिने हाथ से उन्हें मध्य भाग में ग्रहण कर जल में उतर कर उनके साथ ही डुबकी लगावे। (उसी समय वहाँ समस्त तीर्थ भी उनके साथ पहुँच जाते हैं) ॥ २२-२३ ॥ सन्निधिं तत्र तत्कालं प्रकुर्वन्त्यचिरात् तु वै ॥ २३ ॥ निःशेषाणि च तीर्थानि लोकत्रयगतानि च। मन्त्रात्मा यत्र रक्षार्थं क्षणमास्ते जलाशये ॥ २४ ॥ तत्रायतनतीर्थानां सर्वेषां स्यात् समागमः। किं पुनर्यत्र भगवान् मन्त्रमूर्तिरधोक्षजः ॥ २५ ॥ साधकाभ्यर्थितः स्नायात् सर्वानुग्रहया धिया। तत्काले तत्तीर्थे सर्वतीर्थसान्निध्यप्रभावमाह—सन्निधिमिति त्रिभिः ॥ २३-२६॥ जब मन्त्रात्मा प्रभु रक्षा के लिये, क्षण भर के लिये भी जलाशय में उपस्थित हो जाते हैं, तभी तीनों लोकों के समस्त तीर्थ उस जलाशय में पहुँच जाते हैं ॥ २३-२४ ॥ इस प्रकार उस जलाशय में समस्त आयतनों तथा समस्त तीर्थों का एकत्र समागम हो जाता है। जहाँ अधोक्षज भगवान् विष्णु मन्त्रमूर्त्ति रूप से विराज रहे हों वहाँ सभी तीर्थ आयतन क्यों न उपस्थित हो? ॥ २५ ॥ साधकों से अभ्यर्थित जो तीर्थ प्राप्त कर इस विधि से स्नान करता है वह तत्त्ववेत्ता है। सभी साधकों को इसी प्रकार सर्वानुग्रह बुद्धि से स्नान करना चाहिये ॥ २६ ॥ विद्वान् योऽनेन विधिना तीर्थमासाद्य तत्त्ववित् ॥ २६ ॥ स्नापयेद् बन्धुमित्रादीन् प्राप्नुवन्त्यचिराच्च ते। तैर्थं फलमनायासान्मन्त्रमूर्तेः प्रसादतः ॥ २७ ॥ एवं कूर्च्चद्वारा दूरदेशगतानां जनानामपि तीर्थस्नानं फलाधायकमित्याह—विद्वा-