भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 407

३४८ सात्वतसंहिता द्वादशान्त में, वृत्तमण्डल मध्य में ध्यान कर, पञ्चतन्मात्राओं से निर्मुक्त उसी में अपने शरीर को जला देवे । फिर दाहिने पैर के अङ्गुष्ठ प्रान्त प्रदेश में युगान्त अग्निस्वरूप ज्वाला-शत स्वरूप शिखाक्षर का ध्यान कर चारों ओर उसी में जलते हुए अपने विग्रह का ध्यान करे ॥ २२-२५ ॥ फिर अपने देह की उस ज्वाला को मन्त्रनाथ में लीन होते हुए उसी का ध्यान करे । दिव्य प्रशान्ताकार उन मन्त्रनाथ को चित्त पर स्थापित कर, अपने मन्त्र से प्रतिपाद्य द्वादशान्त स्थित भगवान् से निकले हुए अमृत समूह रूप जल से अपने विग्रह का आसिञ्चन करे । तदनन्तर मन्त्र सहित उस बिम्ब को द्वादशाङ्गुल के ऊपर स्थित वृत्तमण्डल के मध्य में रहने वाले अपने हृदय में स्थापित करे ॥ २५-२६ ॥ करन्यासविधानम् अथ हस्तद्वये न्यसेद् दीप्तिमद् द्वादशाक्षरम् ॥ २७ ॥ मणिबन्धान्नखाग्रं तु मूलमन्त्रपुरस्सरम् । हृदादयोऽस्त्रपर्यन्ता अङ्गुष्ठाद्यङ्गुलीषु च ॥ २८ ॥ सर्वासु युग्मयोगेन नेत्रं नखमुखाश्रितम् । करन्यासमाह—अथेति द्वाभ्याम् । द्वादशाक्षरं पूर्वोक्तनृसिंहद्वादशाक्षरमि- त्यर्थः । मूलमन्त्रपुरस्सरं पूर्वोक्तनृसिंहबीजपुरस्सरमित्यर्थः । युग्मयोगेन हस्तद्वयेऽपि युगपदित्यर्थः ॥ २७-२९ ॥ इसके बाद दीप्तिमद् द्वादशाक्षर मूल मन्त्र से दोनों हाथों के मणिबन्ध से नखाग्र तक न्यास करे । इसी प्रकार हृदय से लेकर अस्त्र पर्यन्त तथा अङ्गुष्ठादि अङ्गुलियों में भी हृदयन्यास और करन्यास करे ॥ २७-२८ ॥ इसी प्रकार दोनों हाथों को एक में मिलाकर नख, मुख तथा शिर से ले कर चरण पर्यन्त सुधी साधक द्वादशाक्षर मन्त्र का देह में न्यास करे ॥ २९ ॥ अङ्गन्यासविधानम् आमूर्ध्नश्चरणान्तं तु द्वादशार्णं न्यसेत् तनौ ॥ २९ ॥ जीवभूतं तदन्तःस्थं मूलमन्त्रं तथा न्यसेत् । हृदाद्यं नेत्रपर्यन्तमङ्गषट्कं स्वगोचरे ॥ ३० ॥ स्वस्वाङ्गुलियुगेनैव तेजोरूपं विनाऽऽकृतेः । श्रीवत्सं वक्षसो वामे पूर्णेन्दुसदृशद्युतिम् ॥ ३१ ॥ अङ्गन्यासमाह—आमूर्ध्न इति द्वाभ्याम् । स्वगोचरे = हृदयादिस्थानेष्वि- त्यर्थः । स्वस्वाङ्गुलियुगेन = वक्ष्यमाणहृदादिमुद्रयेत्यर्थः । आकृतेर्विना = निराकार- मित्यर्थः ॥ २९-३१ ॥