भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 411

३५२ सात्वतसंहिता ज्ञातव्याऽऽराधकेनैव नित्यं कर्मणि कर्मणि ॥ ४१ ॥ सर्वमन्त्राराधनेष्वप्ययमेवावाहनादिक्रमो ज्ञेय इत्याह— क्रम इति सार्धेन ॥ ४०-४१ ॥ आराधक को इसी प्रकार इन देवताओं के भूषणादि लाञ्छनपूर्वक क्रियाओं का ध्यान एवं इनकी आवाहनादि क्रम की कल्पना नित्य प्रत्येक कर्म में जानना चाहिये ॥ ४१ ॥ मन्त्रन्यासमतः कुर्याद् हस्तन्यासं विना विभोः । ध्यात्वाऽथ भावनाजातैर्भोगैः परमपावनैः ॥ ४२ ॥ पूजयित्वा जपान्तं चाप्यवतार्य बहिर्यजेत् । अथ स्वहृदये भगवतोऽङ्गन्यासपूर्वकं जपयज्ञान्तं मानसैरुपचारैरभ्यर्च्य बहिर्यागं च कुर्यादित्याह—मन्त्रन्यासमिति सार्धेन ॥ ४२-४३ ॥ इसके बाद अपने हृदय में भगवान् का अङ्गन्यासपूर्वक जप, यज्ञान्त मानस उपचारों से पूजन एवं परमपान भोगों से नैवेद्य चढ़ाकर उसके बाद नीचे उतार कर बहिर्याग करे ॥ ४१-४२ ॥ दक्षिणोत्तरहस्ताभ्यां हृद्बीजेन विचिन्त्य च ॥ ४३ ॥ सूर्यसोमौ ततः कुर्याद् द्रव्यदाहसमुद्भवौ । तोयमादाय पात्रेऽथ तत्र हृन्मन्त्रितं क्षिपेत् ॥ ४४ ॥ बहिर्यागविधिं दर्शयन् प्रथममर्घ्यादीनां दहनाप्यायनमुद्रादर्शनमाह— दक्षिणेति ॥ ४३-४४ ॥ दायें बायें दोनों हाथों से हृद् बीज (नमः) से भगवान् का ध्यान कर प्रथम अर्घ्य मुद्रा प्रदर्शित करे । फिर दहन एवं आप्यायन मुद्रा प्रदर्शित करे । फिर सूर्य तथा सोम से द्रव्य का दाह तथा उसकी उत्पत्ति करे । अब पूजन सामग्री का प्रोक्षण कहते हैं—किसी पात्र में जल ले कर हृदय मन्त्र (नमः) से अभिमन्त्रित कर उससे सभी सामग्री का प्रोक्षण करना चाहिये ॥ ४३-४४ ॥ पुष्पगन्धसमोपेतं सुसितं शालितण्डुलम् । मन्त्रयेत् प्रणवाद्येन बहुशो हृदयेन तु ॥ ४५ ॥ तदुद्धृतेनाम्भसा वा अस्त्रमन्त्रं समुच्चरन् । प्रोक्षयेत् स्वासनस्थानं यागोपकरणं तथा ॥ ४६ ॥ पूजोपकरणानां प्रोक्षणमाह—तोयमिति सार्धद्वयाभ्याम् ॥ ४४-४६ ॥ इसके बाद पुष्पगन्ध से वासित सुन्दर एवं श्वेत शाली धान के चावल को प्रणवादि हृदय मन्त्र (ॐनमः) से अभिमन्त्रित करे ॥ ४५ ॥