भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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अथवा उससे अभिमन्त्रित जल से, अस्त्र मन्त्र का उच्चारण करते हुए, उस जल से, आसन स्थान तथा याग सामग्री का सम्प्रोक्षण करे ॥ ४६ ॥ चित्रस्थाद् भगवद्बिम्बाद् भुक्तं पुष्पादिकं हि यत् । अपनीय तु तत्कुर्याद् वाससा रेणुमार्जनम् ॥ ४७ ॥ चित्रबिम्बशोधनमाह—चित्रस्थादिति ॥ ४७ ॥ चित्र स्वरूप भगवद्बिम्ब के ऊपर चढ़ाये गये पुष्पादिकों को दूर फेंक देवे और समस्त पूजा स्थान आर्द्रवस्त्र से परिमार्जित कर शुद्ध करे ॥ ४७ ॥ धातुद्रव्यमये कुर्यात् क्षालनं गन्धवारिणा । लोहमयस्य शोधनमाह—धात्विति ॥ ४८ ॥ यदि धातुमय (लोहादि) द्रव्य निर्मित हो तब सुगन्धित जल से उसका प्रक्षालन कर देवे । फिर जल सहित गोमय द्वारा समस्त पूजा स्थान का उपलेपन कर देवे ॥ ४८ ॥ मण्डलरचनाविधानम् उपलिप्याथ भूभागं साम्भसा गोमयेन तु ॥ ४८ ॥ तत्र मण्डलमालेख्यं सूत्रयित्वा पुरा समम् । चतुरश्रं चतुर्द्वारं मार्गपीठाब्जभूषितम् ॥ ४९ ॥ त्रिनाभिनेमिषडरं चक्रं तु कमलाद् बहिः । मेध्यैः सितादिकै रागैः पुष्पैर्वा तैश्च तैः शुभैः ॥ ५० ॥ चन्दनाद्यैः सुगन्धैस्तु सर्षपैस्तिलतण्डुलैः । सर्वौषधिमयेनैव चूर्णेन परिपूर्य वा ॥ ५१ ॥ मण्डलरचनाप्रकारमाह—उपलिप्येत्यादिभिः ॥ ४८-५१ ॥ अब मण्डल रचना का प्रकार कहते हैं—उपलेपन के बाद वहाँ चतुष्कोण चार द्वारों वाला मार्गपीठ तथा कमल से भूषित मण्डल बनाना चाहिये ॥ ४९ ॥ फिर कमल से बाहर जिसमें तीन नाभि हो, नेमि हो, छह अरायें हों ऐसा चक्र निर्माण करे । वह चक्र स्थान अत्यन्त पवित्र श्वेत रङ्ग से, अथवा श्वेत शुभ पुष्पों से, सुगन्धित चन्दनों से, सरसों से, तिल तण्डुल से तथा सर्वौषधिमय के चूर्णों से अच्छी तरह परिपूर्ण होना चाहिये ॥ ५०-५१ ॥ पीठपरिकल्पनप्रकारकथनम् पुष्पै स्थाद्यर्घ्यपात्रं तु मन्त्रैः सम्पूज्य निष्कलैः । पात्रेऽपरस्मिंस्तस्माद् वै स्तोकमुद्धृत्य चोदकम् ॥ ५२ ॥