भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 413

३५४ सात्वतसंहिता योगपीठार्चनं कुर्यादनुसन्धानपूर्वकम् । स्वनाम्ना प्रणवाद्येन नमोऽन्तेन यथाक्रमम् ॥ ५३ ॥ अनन्तेशं स्मरेन्मध्ये सर्वाधारमयं प्रभुम् । आग्नेयादौ तु धर्माद्यमैशान्यान्तं चतुष्टयम् ॥ ५४ ॥ प्रागादावप्यधर्माद्यमुत्तरान्तं न्यसेत् परम् । तदूर्ध्वं कमलं ध्यायेत् स्वनाम्नाऽथ तथोपरि ॥ ५५ ॥ स्मरेत् पत्राश्रितं सूर्य शशाङ्कं केसरावनौ । कर्णिकास्थं हुतभुजं ततो गन्धादिना यजेत् ॥ ५६ ॥ पीठपरिकल्पनप्रकारमाह—पुष्पैरित्यादिभिः ॥ ५२-५६ ॥ इसके बाद निष्कल मन्त्रों से पुष्प द्वारा अर्घ्यपात्र का पूजन करे। फिर उसमें से किसी दूसरे पात्र में जल निकाले ॥ ५२ ॥ तदनन्तर सावधानी से उस जल द्वारा प्रणवपूर्वक स्वनाम, तदनन्तर नमः शब्द से योगपीठ का यथाक्रम अर्चन करे ॥ ५३ ॥ मण्डल के मध्य में सर्वाधारमय प्रभु अनन्तेश का स्मरण करते हुए पूजन करे। आग्नेय से लेकर ईशानकोण पर्यन्त धर्मादि चार (धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्यादि) का न्यास करे ॥ ५४ ॥ पूर्व दिशा से लेकर उत्तर दिशा पर्यन्त अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य तथा अनैश्वर्यादि का न्यास करे। इसके बाद उसके ऊपर अपने नाम से कमल का ध्यान करे ॥ ५५ ॥ कमलपत्र पर सूर्य का, केशर स्थान पर चन्द्रमा का, कर्णिका पर अग्निदेव का ध्यान कर फिर गन्धादि द्वारा कमल की पूजा करे ॥ ५६ ॥ महाकुम्भस्थापनकथनम् गणेशाद्यर्चनं कृत्वा प्रथमं गुरुसन्ततेः । प्राप्तानुज्ञोऽथ कलशमादाय शुभलक्षणम् ॥ ५७ ॥ तमम्भसाऽस्त्रजप्तेन सम्पूर्यादौ तु निक्षिपेत् । तद्गर्भे काञ्चनं रत्नं बीजान्योषधिसत्फलम् ॥ ५८ ॥ चूतादिविटपोद्भूतां सपत्रां पुष्पमञ्जरीम् । कौशेयवस्त्रकण्ठं कृत्वा चन्दनचर्चितम् ॥ ५९ ॥ तन्मध्ये पूजयेन्मन्त्रं साङ्गं सावरणं क्रमात् । प्राग्दिङ् मण्डलबाह्येऽथ दत्वा वै पुष्पचक्रिकाम् ॥ ६० ॥ पीठमन्त्रोपजप्तां च तदूर्ध्वे स्थापयेच्च तम् ।