सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३८ सात्वतसंहिता यह ताड़न अनादि काल से उठी हुई वासना के बन्धन को दूर करने के लिये किया जाता है । फिर फडन्त अस्त्रमन्त्र कुशा के अग्रभाग से शिष्य के पैर से लेकर शिखान्त तक उसके कर्म मार्ग को सीधा करने के लिये लिखे । जब उसका सारा शरीर मन्त्र जाल से व्याप्त तथा आच्छन्न हो गया है ऐसा देखे, तब नेत्रमन्त्र से वस्त्र द्वारा उसके दोनों नेत्र बाँध देवे । फिर वसु, अर्घ्य, पुष्प तथा गन्ध से उसकी अञ्जलि पूर्ण करे ॥ ११५-११७ ॥ पाणिनादाय चाम्रे वा निधायाग्रस्थितं बटुम् । प्रक्षेपयेद् देवधाम्नि नतमूर्ध्नाऽञ्जलिं च तम् ॥ ११८ ॥ फिर अपने आगे बैठे हुए उस वटु को शिर नीचा कर, अञ्जलि बँधवा कर, अपने हाथ से उठाकर, अथवा आम्रपल्लव पर बिठाकर देवलोक की ओर प्रक्षिप्त करे ॥ ११८ ॥ तस्योद्घाटितनेत्रस्य त्वदृष्टस्येतरैर्जनैः । कुशलाध्वनिविष्टस्य दृष्ट्वा वै भक्तिलक्षणम् ॥ ११९ ॥ फिर कल्याणकारी मार्ग में निविष्ट इतर जनों को दिखाई न पड़ने वाले और खुले नेत्रों वाले उस शिष्य में भक्ति का लक्षण देखे ॥ ११९ ॥ रोमाञ्चौत्सुक्यहर्षाढ्यमानन्दाश्रुसमन्वितम् । सप्रणामजपालापदिक्प्रदक्षिणसंयुक्तम् ॥ १२० ॥ उस शिष्य में रोमाञ्च, औत्सुक्य, हर्ष, आनन्दाश्रु, प्रणाम, जप, आलाप तथा दिशाओं की प्रदक्षिणा आदि लक्षण देखे ॥ १२० ॥ शुद्धान्तःकरणं बुद्ध्वा योग्योऽयमिति भावयेत् । यदा तदाऽच्युतात्मानमात्मानं भावयंस्ततः ॥ १२१ ॥ तब उसका अन्तःकरण शुद्ध जानकर यह दीक्षा योग्य है, ऐसा विचार करे । फिर गुरु अपने में अच्युतात्मवत्ता की भावना करे ॥ १२१ ॥ स्मरेद् दक्षिणपाणौ तु चक्राम्बुरुहमध्यगम् । प्रधानदेवतावृन्दं स्वे स्वे धाम्नि परे स्थितम् ॥ १२२ ॥ स्वमरीचिगणेनैव द्योतयन्तं तु चाखिलम् । तेनाच्युतकरेणैव सोदकेनालभेत तम् ॥ १२३ ॥ पुष्पपूर्णाञ्जलौ पृष्ठे तस्य तत्रितयाश्रितम् । कृत्वा मन्त्रगणान्तं वै मोक्षविघ्नोपशान्तये ॥ १२४ ॥ अपने दाहिने हाथ में, चक्रकमल के मध्य में, प्रधान देव वृन्दों को अपने-