सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशः परिच्छेदः ४३९ अपने धाम में स्थित देखे । जो अपने तेजों से सारे विश्व को प्रकाशित करते हैं, ऐसे अच्युत युक्त अपने सजल हाथ से शिष्य का स्पर्श करे और अर्घ्यपुष्प गन्ध से परिपूर्ण उसकी अञ्जलि को दीक्षा में मन्त्रगणान्त विघ्न शान्ति के लिये पीछे की ओर प्रक्षिप्त करा देवे ॥ १२२-१२४ ॥ पुनरभ्यर्चयेन्नीत्वा मन्त्रेण परमेश्वरम् । आधाराधेयभावेन बुद्ध्वाऽन्तःसंस्थितिं पुरा ॥ १२५ ॥ क्षमादीनां बुद्धिनिष्ठानां वासनानां तथात्मनः । ततः कुर्याच्च विश्लेषणं तेषां ध्यानार्चनादिना ॥ १२६ ॥ आत्मतत्त्वं समाश्रित्य कर्मचक्रं हि वर्तते । तच्चक्रमवलम्ब्यास्ते बुद्धिनिष्ठं हि सप्तकम् ॥ १२७ ॥ अज्ञानं व्यापकत्वं च सुखदुःखादि वेदनम् । सर्वज्ञस्यात्मतत्त्वस्य कर्मचक्रावलम्बनात् ॥ १२८ ॥ चपलं कर्मचक्रं तद् वर्धमानं सदैव हि । क्षमाद्यमाधारमाश्रित्य तावदेवावतिष्ठते ॥ १२९ ॥ यावत् सर्वज्ञशक्त्या वै कर्मात्मा न प्रबोधितः । प्रबुद्धस्तस्य संरोधं कर्तुं शक्नोति सर्वदा ॥ १३० ॥ फिर मण्डल के पास शिष्य को ले जाकर मन्त्र द्वारा परमेश्वर का अर्चन करावे । तदनन्तर अन्तःकरण की स्थिति आधार-आधेय भाव से ही है ऐसा समझ कर क्षमादिकों को तथा बुद्धिनिष्ठ वासनाओं को आत्मा से ध्यान अर्चन के द्वारा अलग करावे । यतः समूचा कर्मतत्त्व, आत्मतत्त्व का आश्रय लेकर स्थित है और उसी कर्मचक्र का अवलम्बन कर बुद्धि में रहने वाले पृथ्व्यादि सप्तक तथा अज्ञान व्यापकत्त्व सुख-दुःखादि ज्ञान भी स्थित है । यह समस्त कर्मचक्र सर्वज्ञ आत्मतत्त्व का आलम्बन किये हुए है । उस आलम्बन से यह कर्मचक्र नित्य बढ़ता है और वही क्षमा आदि का आधार लेकर तभी तक स्थित रहता है । जब तक सर्वज्ञ शक्ति कर्मात्मा का प्रबोध नहीं करती । जब वह सर्वज्ञ शक्ति प्रबुद्ध हो जाती है तब वह कर्मचक्र का संरोध करने में सर्वदा सशक्त हो जाती है ॥ १२५-१३० ॥ मन्त्राराधनपूर्वेण ज्ञाननिष्ठेन कर्मणा । अतो य आश्रयः क्ष्माद्यः सत्त्वसारो हि पौरुषः ॥ १३१ ॥ नीरसं चेरिणीभूतं कुर्यात् संस्थाप्य साम्प्रतम् । निर्मुक्तचित्फलो येन कर्मवृक्षो विनश्यति ॥ १३२ ॥ इसलिये कर्मचक्र के आश्रयभूत क्षमादि जो सत्त्वसार पौरुष है उन्हें मन्त्रा-